कांग्रेस प्रणाली की चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना | Class 12 Political Science Notes in Hindi
परिचय (Introduction)
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत की राजनीति में लगभग दो दशकों तक Jawaharlal Nehru और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रभाव बना रहा। इस दौर को राजनीति के विद्वानों ने “कांग्रेस प्रणाली (Congress System)” कहा है, क्योंकि केंद्र और अधिकांश राज्यों में कांग्रेस का राजनीतिक वर्चस्व था।
लेकिन वर्ष 1964 से 1967 के बीच भारतीय राजनीति में ऐसे घटनाक्रम हुए जिन्होंने इस व्यवस्था को गंभीर चुनौती दी। यह समय केवल नेतृत्व परिवर्तन का नहीं था, बल्कि आर्थिक संकट, खाद्यान्न की कमी, बढ़ती महँगाई, राजनीतिक असंतोष और विपक्ष के उभरने का भी दौर था। इन्हीं परिस्थितियों ने भारतीय लोकतंत्र को बहुदलीय प्रतिस्पर्धा की दिशा में आगे बढ़ाया।
1964 के बाद भारत की राजनीतिक स्थिति
27 मई 1964 को प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru के निधन के साथ भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हुआ। लगभग 17 वर्षों तक उनके नेतृत्व में देश ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया और विकास की दिशा तय की।
हालाँकि, उनके निधन के बाद देश कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा था—
- आर्थिक विकास की गति अपेक्षाकृत धीमी थी।
- खाद्यान्न उत्पादन पर्याप्त नहीं था।
- लगातार सूखे की स्थिति से कृषि प्रभावित हुई।
- महँगाई बढ़ रही थी।
- बेरोज़गारी और गरीबी बड़ी समस्या बनी हुई थी।
- कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद उभरने लगे थे।
जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद की चुनौतियाँ
नेहरू के निधन के बाद सबसे बड़ी चुनौती स्थिर राजनीतिक नेतृत्व प्रदान करने की थी। नेहरू केवल प्रधानमंत्री ही नहीं, बल्कि कांग्रेस संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाए रखने वाले नेता भी थे।
उनके जाने के बाद कई समस्याएँ सामने आईं—
- नेतृत्व का अभाव
नेहरू जैसा सर्वमान्य नेता कांग्रेस के पास नहीं था। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच नए प्रधानमंत्री के चयन को लेकर चर्चा शुरू हुई।
- आर्थिक संकट
देश को खाद्यान्न की कमी, विदेशी सहायता पर निर्भरता तथा बढ़ती महँगाई जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।
- राजनीतिक असंतोष
विपक्षी दल धीरे-धीरे मजबूत हो रहे थे और कांग्रेस के विरुद्ध जनमत तैयार करने लगे थे।
- संगठनात्मक चुनौतियाँ
कांग्रेस के भीतर विभिन्न नेताओं के अलग-अलग विचार सामने आने लगे, जिससे पार्टी में गुटबाज़ी बढ़ने लगी।
लाल बहादुर शास्त्री का कार्यकाल एवं निधन
लाल बहादुर शास्त्री जी का व्यक्तित्व सरल, ईमानदार और व्यवहारिक माना जाता था। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में देश का नेतृत्व किया। उनके कार्यकाल की प्रमुख विशेषताएँ—
- 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध –
वर्ष 1965 में पाक के साथ युद्ध हुआ। भारतीय सेना ने साहस-पूर्वक देश की रक्षा की और शास्त्री जी के नेतृत्व की व्यापक सराहना हुई।
- “जय जवान, जय किसान” –
शास्त्री जी ने सैनिकों और किसानों के महत्व को रेखांकित करते हुए “जय जवान, जय किसान” का नारा दिया। यह आज भी भारत के सबसे प्रेरणादायक नारों में गिना जाता है।
- ताशकंद समझौता और निधन –
युद्ध समाप्त होने के बाद जनवरी 1966 में ताशकंद में भारत और पाकिस्तान के बीच समझौता हुआ। समझौते के तुरंत बाद 11 जनवरी 1966 को शास्त्री जी का अचानक निधन हो गया।
इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री बनना
शास्त्री जी के निधन के बाद कांग्रेस के भीतर नए नेता के चयन का प्रश्न सामने आया। अंततः जनवरी 1966 में इंदिरा गांधी को भारत का प्रधानमंत्री चुना गया।
उस समय कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना था कि इंदिरा गांधी संगठन के अनुभवी नेताओं की सलाह के अनुसार कार्य करेंगी। लेकिन आगे चलकर उन्होंने स्वतंत्र राजनीतिक निर्णय लेने शुरू किए और धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बनाई।
इंदिरा गांधी के सामने अनेक चुनौतियाँ थीं—
- आर्थिक संकट
- खाद्यान्न की कमी
- बढ़ती महँगाई
- सूखा
- विपक्ष का बढ़ता प्रभाव
- कांग्रेस के भीतर मतभेद
यही परिस्थितियाँ आगे चलकर कांग्रेस के भीतर टकराव का कारण बनीं।
‘सिंडिकेट‘ (Syndicate) क्या था?
‘सिंडिकेट’ (Syndicate) कांग्रेस पार्टी के उन प्रभावशाली वरिष्ठ नेताओं का समूह था, जो संगठन पर मजबूत पकड़ रखते थे और पार्टी के महत्वपूर्ण निर्णयों, विशेषकर नेतृत्व चयन, में अहम भूमिका निभाते थे। यह कोई औपचारिक संगठन नहीं था, बल्कि कांग्रेस के शक्तिशाली नेताओं का अनौपचारिक समूह था।
प्रमुख नेता –
- Kamaraj – सिंडिकेट के सबसे प्रभावशाली नेता माने जाते थे। वे कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे और “कामराज योजना” के लिए प्रसिद्ध थे।
- Nijalingappa – कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- Atulya Ghosh – पश्चिम बंगाल के प्रभावशाली कांग्रेस नेता और संगठन के प्रमुख रणनीतिकार।
- K. Patil – महाराष्ट्र के वरिष्ठ कांग्रेस नेता, जिन्हें संगठन पर मजबूत पकड़ के लिए जाना जाता था।
- नीलम संजीव रेड्डी (Neelam Sanjiva Reddy) – कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, बाद में (भारत के राष्ट्रपति भी बने। 25 जुलाई 1977 को भारत के निर्विरोध छठे राष्ट्रपति बने। उनका कार्यकाल 25 जुलाई 1977 से 25 जुलाई 1982 तक रहा।)
NOTE- 1969 में जब कांग्रेस के भीतर सिंडिकेट और Indira Gandhi के बीच संघर्ष हुआ, तब नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति नहीं थे। उस समय वे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सिंडिकेट के प्रमुख नेताओं में से एक थे। उन्हें 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में सिंडिकेट ने उम्मीदवार बनाया था, लेकिन वे V. V. Giri से चुनाव हार गए।
1967 का आम चुनाव और कांग्रेस प्रणाली को चुनौती
वर्ष 1967 में चौथे लोकसभा चुनाव आयोजित हुए। यह चुनाव भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण मोड़ (Turning Point) था। इस चुनाव में पहली बार कांग्रेस को पूरे देश में कड़ी चुनौती मिली।
इसके प्रमुख कारण थे—
- आर्थिक कठिनाइयाँ
- महँगाई
- खाद्यान्न संकट
- बेरोज़गारी
- कांग्रेस के भीतर गुटबाज़ी
- विपक्षी दलों का आपसी सहयोग
कई राज्यों में विपक्षी दलों ने मिलकर कांग्रेस के विरुद्ध चुनाव लड़ा, जिससे चुनावी मुकाबला पहले की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी हो गया।
1967 चुनाव के परिणाम एवं राजनीतिक प्रभाव
1967 के चुनावों में कांग्रेस केंद्र में सरकार बनाने में सफल रही, लेकिन उसकी स्थिति पहले की तुलना में काफी कमजोर हो गई।
इस चुनाव के प्रमुख परिणाम थे—
- कांग्रेस के लोकसभा में बहुमत में उल्लेखनीय कमी आई।
- कई राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।
- अनेक राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ।
- विपक्ष पहले की तुलना में अधिक संगठित और प्रभावशाली बनकर उभरा।
- भारतीय राजनीति में गठबंधन राजनीति (Coalition Politics) की शुरुआत का मार्ग प्रशस्त हुआ।
- कांग्रेस प्रणाली के अजेय होने की धारणा पहली बार कमजोर पड़ी।
यद्यपि कांग्रेस केंद्र में सत्ता में बनी रही, लेकिन 1967 का चुनाव यह स्पष्ट कर चुका था कि भारतीय लोकतंत्र में अब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का नया दौर शुरू हो चुका है। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर कांग्रेस के भीतर संघर्ष, 1969 के विभाजन और कांग्रेस प्रणाली की पुनर्स्थापना की पृष्ठभूमि बनीं।
महत्वपूर्ण तथ्य:
- सिंडिकेट ने 1966 में Indira Gandhi को प्रधानमंत्री बनने में समर्थन दिया।
- बाद में इंदिरा गांधी और सिंडिकेट के बीच नीतिगत तथा नेतृत्व संबंधी मतभेद बढ़ गए।
- 1969 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान यह संघर्ष खुलकर सामने आया।
- अंततः 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ और पार्टी कांग्रेस (O) तथा कांग्रेस (R) में बँट गई।
महत्वपूर्ण शब्दावली
|
शब्द |
अर्थ |
| कांग्रेस प्रणाली (Congress System) | स्वतंत्रता के बाद का वह दौर जब केंद्र और अधिकांश राज्यों में कांग्रेस का राजनीतिक प्रभुत्व था। |
| सिंडिकेट (Syndicate) | कांग्रेस के प्रभावशाली वरिष्ठ नेताओं का समूह, जो संगठन के महत्वपूर्ण निर्णयों में प्रमुख भूमिका निभाता था। |
| गुटबाज़ी (Factionalism) | किसी राजनीतिक दल के भीतर अलग-अलग नेताओं या समूहों के बीच मतभेद और प्रतिस्पर्धा। |
| गठबंधन राजनीति (Coalition Politics) | जब दो या अधिक राजनीतिक दल मिलकर सरकार बनाते हैं या चुनाव लड़ते हैं। |
| राजनीतिक उत्तराधिकार (Political Succession) | किसी प्रमुख नेता के पद छोड़ने या निधन के बाद नए नेतृत्व का चयन और सत्ता का हस्तांतरण। |
गरीबी हटाओ महत्वपूर्ण तथ्य –
- नारा: “गरीबी हटाओ”
- नेता: Indira Gandhi
- मुख्य चुनाव: 1971 का लोकसभा चुनाव
- मुख्य उद्देश्य: गरीबी उन्मूलन, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता।
- यह नारा कांग्रेस (R) की जनोन्मुखी राजनीति का प्रतीक था और 1971 की चुनावी सफलता का प्रमुख आधार बना।
बैंकों का राष्ट्रीयकरण
बैंकों का राष्ट्रीयकरण भारत के राजनीतिक और आर्थिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। 19 जुलाई 1969 को प्रधानमंत्री Indira Gandhi की सरकार ने 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों (Major Commercial Banks) का राष्ट्रीयकरण किया।
प्रिवी पर्स की समाप्ति (Abolition of Privy Purses महत्वपूर्ण तथ्य –
- संविधान संशोधन – 26वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1971
- प्रधानमंत्री – इंदिरा गांधी (जनोन्मुखी (Pro-Poor) छवि और मजबूत हुई)
- क्या समाप्त हुआ? –
- पूर्व रियासतों के शासकों को मिलने वाला प्रिवी पर्स (सरकारी भत्ता)।
- उनकी आधिकारिक मान्यता और विशेषाधिकार।
- मुख्य उद्देश्य – समानता, समाजवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करना।
निष्कर्ष –
कांग्रेस प्रणाली की चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का महत्वपूर्ण अध्याय भी है।
1967 के चुनाव के बाद कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ, जिससे भारतीय राजनीति में गठबंधन राजनीति का आरंभ हुआ। इसी दौरान कांग्रेस के भीतर संगठन और सरकार के बीच मतभेद बढ़े, जो 1969 में कांग्रेस के विभाजन का कारण बने।
प्रधानमंत्री Indira Gandhi ने संगठन के पारंपरिक नेतृत्व को चुनौती देते हुए अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाई। “गरीबी हटाओ” का नारा, बैंकों का राष्ट्रीयकरण तथा प्रिवी पर्स की समाप्ति जैसे निर्णयों ने उन्हें व्यापक जनसमर्थन दिलाया।
1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस (आर) की भारी जीत और उसी वर्ष Bangladesh के निर्माण में भारत की भूमिका ने कांग्रेस की लोकप्रियता को पुनः स्थापित किया।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा, शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन और जनता की निर्णायक भूमिका है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
प्रशन-1. कांग्रेस प्रणाली (Congress System) क्या थी?
उत्तर- स्वतंत्रता के बाद का वह राजनीतिक दौर जब केंद्र और अधिकांश राज्यों में कांग्रेस का प्रभुत्व था।
प्रशन-2. कांग्रेस प्रणाली को पहली बड़ी चुनौती कब मिली?
उत्तर- 1967 के आम चुनाव में।
प्रशन-3. 1967 का चुनाव ऐतिहासिक क्यों माना जाता है?
उत्तर- क्योंकि पहली बार कांग्रेस की राजनीतिक शक्ति में उल्लेखनीय कमी आई और कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं।
प्रशन-4. सिंडिकेट क्या था?
उत्तर- कांग्रेस के प्रभावशाली वरिष्ठ नेताओं का समूह।
प्रशन-5. इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री कब बनीं?
उत्तर- जनवरी 1966 में।
प्रशन-6. कांग्रेस का विभाजन कब हुआ?
उत्तर- 1969 में।
प्रशन-7. कांग्रेस (O) और कांग्रेस (R) का क्या अर्थ था?
उत्तर- कांग्रेस (O) संगठन के पुराने नेताओं का समूह था, जबकि कांग्रेस (R) इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाला समूह था।
प्रशन-8. “गरीबी हटाओ” का नारा किसने दिया?
उत्तर- इंदिरा गांधी ने।
प्रशन-9. बैंकों का राष्ट्रीयकरण कब हुआ?
उत्तर- 1969 में।
प्रशन-10. प्रिवी पर्स क्या था?
उत्तर- पूर्व रियासतों के शासकों को दिया जाने वाला सरकारी भत्ता।
प्रशन-11. 1971 का चुनाव किस नारे पर लड़ा गया?
उत्तर- “गरीबी हटाओ”।
प्रशन-12. कांग्रेस प्रणाली की पुनर्स्थापना कब हुई?
उत्तर- 1971 के चुनाव और बांग्लादेश युद्ध के बाद।
प्रशन-13. बांग्लादेश का गठन किस वर्ष हुआ?
उत्तर- 1971 में।
प्रशन-14. भारतीय राजनीति में गठबंधन युग की शुरुआत किस चुनाव के बाद मानी जाती है?
उत्तर- 1967 के चुनाव के बाद।
प्रशन-15. इस अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर- लोकतंत्र में जनता का निर्णय सर्वोपरि होता है और राजनीतिक परिवर्तन लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाते हैं।