लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट (The Crisis of Democratic Order) Class 12 Political Science Notes Hindi
परिचय (Introduction)
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में अपनी पहचान बनाई। भारत का संविधान नागरिकों को मौलिक अधिकार, स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों की गारंटी देता है। हालांकि, स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक ऐसा दौर भी आया जब इन लोकतांत्रिक संस्थाओं और अधिकारों पर गंभीर प्रश्न खड़े हुए। यह दौर था 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक लागू राष्ट्रीय आपातकाल (Emergency) का।
लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट केवल आपातकाल की घोषणा तक सीमित नहीं था। इसके पीछे कई वर्षों से चल रही राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट, बढ़ती बेरोज़गारी, महँगाई, भ्रष्टाचार के आरोप और विपक्षी आंदोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस समय केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच टकराव लगातार बढ़ता गया, जिसका परिणाम भारतीय लोकतंत्र के सबसे विवादास्पद अध्याय के रूप में सामने आया।
आपातकाल (Emergency) की पृष्ठभूमि
1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत भारत के लिए अनेक चुनौतियों का समय था। 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ, जिससे भारतीय राजनीति में नई परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं। इसके बाद 1971 के आम चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi ने “गरीबी हटाओ” के नारे के साथ ऐतिहासिक विजय प्राप्त की।
1971 में भारत ने Bangladesh Liberation War में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे सरकार की लोकप्रियता काफी बढ़ी। लेकिन युद्ध के बाद देश को गंभीर आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा।
इन परिस्थितियों ने जनता में असंतोष बढ़ाया और सरकार के विरुद्ध विरोध आंदोलनों की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे यह असंतोष राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया।
1970 के दशक की आर्थिक एवं राजनीतिक परिस्थितियाँ
- बढ़ती महँगाई
1973 के वैश्विक तेल संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में भारी वृद्धि हुई। इसका सीधा प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। आवश्यक वस्तुओं के दाम तेजी से बढ़ने लगे और आम जनता महँगाई से परेशान हो गई।
मुख्य कारण थे—
- वैश्विक तेल संकट (Oil Crisis)
- कृषि उत्पादन में गिरावट
- खाद्यान्न की कमी
- बढ़ती जनसंख्या
- सरकारी वित्तीय दबाव
- बेरोज़गारी
देश में शिक्षित युवाओं की संख्या बढ़ रही थी, लेकिन रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं थे। युवाओं में असंतोष लगातार बढ़ने लगा। अनेक छात्र संगठन सरकार के खिलाफ आंदोलन करने लगे।
- भ्रष्टाचार के आरोप
सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार को लेकर जनता में असंतोष बढ़ रहा था। विपक्ष ने सरकार पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगाए। इससे सरकार की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।
- राजनीतिक अस्थिरता
हालाँकि केंद्र में सरकार को बहुमत प्राप्त था, लेकिन राज्यों में विरोधी दलों और छात्र संगठनों के आंदोलन लगातार तेज हो रहे थे। विपक्ष सरकार को निरंकुश बताते हुए उसके खिलाफ जनसमर्थन जुटा रहा था।
इदिरा गाँधी बनाम विपक्ष
1974–75 तक सरकार और विपक्ष के बीच संघर्ष अत्यधिक तीव्र हो चुका था।
विपक्षी दलों का आरोप था कि—
- सरकार निरंकुश होती जा रही है।
- लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान नहीं किया जा रहा।
- भ्रष्टाचार बढ़ रहा है।
- प्रशासन का राजनीतिक दुरुपयोग हो रहा है।
दूसरी ओर, सरकार का तर्क था कि—
- विपक्ष देश में अस्थिरता फैलाने का प्रयास कर रहा है।
- विकास कार्यों में बाधाएँ उत्पन्न की जा रही हैं।
- आंदोलन लोकतांत्रिक सीमाओं से आगे बढ़ रहे हैं।
इसी बीच एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय ने राजनीतिक संकट को और गंभीर बना दिया।
राज नारायण ने 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत को चुनौती दी थी। 12 जून 1975 को Allahabad High Court ने चुनावी अनियमितताओं के आधार पर इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया तथा उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया।
इस निर्णय के बाद विपक्ष ने प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग की और देशभर में आंदोलन तेज हो गए।
राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा (25 जून 1975)
राजनीतिक संकट लगातार बढ़ रहा था। विपक्ष देशव्यापी आंदोलन चला रहा था और जेपी ने सरकारी कर्मचारियों, पुलिस तथा सेना से संविधान और नैतिक मूल्यों के अनुसार कार्य करने की अपील की।
इन परिस्थितियों में 25 जून 1975 की रात प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर तत्कालीन राष्ट्रपति Fakhruddin Ali Ahmed ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आंतरिक अशांति (Internal Disturbance) के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर दी।
सरकार द्वारा दिए गए प्रमुख कारण –
- देश की आंतरिक सुरक्षा खतरे में थी।
- राजनीतिक अस्थिरता बढ़ रही थी।
- प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो रही थी।
- राष्ट्रीय एकता बनाए रखना आवश्यक था।
विपक्ष का दृष्टिकोण
विपक्ष ने इसे लोकतंत्र पर सबसे बड़ा आघात बताया और कहा कि सरकार अपनी राजनीतिक सत्ता बचाने के लिए आपातकाल लागू कर रही है। आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का सबसे विवादास्पद दौर माना जाता है।
आपातकाल के दौरान लिए गए प्रमुख निर्णय
- मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध
कई मौलिक अधिकारों के प्रयोग पर रोक लगा दी गई। नागरिकों के लिए न्यायालय में अधिकारों की रक्षा हेतु याचिका दायर करना भी अत्यंत सीमित हो गया।
- विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी
Jayaprakash Narayan, Morarji Desai, Atal Bihari Vajpayee, Lal Krishna Advani सहित अनेक विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
- प्रेस सेंसरशिप
- समाचार पत्रों और पत्रिकाओं पर सरकारी सेंसरशिप लागू कर दी गई।
- समाचार प्रकाशित करने से पहले सरकारी अनुमति आवश्यक थी।
- सरकार की आलोचना करने वाली सामग्री प्रकाशित नहीं की जा सकती थी।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर व्यापक नियंत्रण लगाया गया।
- हड़तालों पर नियंत्रण
कई प्रकार की हड़तालों और विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। श्रमिक संगठनों की गतिविधियों पर भी नियंत्रण रखा गया।
- प्रशासनिक अनुशासन
सरकार ने प्रशासनिक दक्षता और अनुशासन बढ़ाने पर जोर दिया। कई सरकारी कार्यक्रमों को तेज़ी से लागू किया गया।
- बीस सूत्रीय कार्यक्रम (Twenty-Point Programme)
सरकार ने आर्थिक सुधारों और गरीबी उन्मूलन के उद्देश्य से 20-सूत्रीय कार्यक्रम लागू किया, जिसके प्रमुख उद्देश्य थे—
- गरीबी कम करना
- भूमि सुधार
- आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता
- महँगाई पर नियंत्रण
- ग्रामीण विकास
- उत्पादन बढ़ाना
- परिवार नियोजन अभियान
इस अवधि में परिवार नियोजन कार्यक्रम को बहुत आक्रामक रूप से लागू किया गया। विशेष रूप से Sanjay Gandhi से जुड़े अभियानों को लेकर बाद में व्यापक आलोचना हुई, क्योंकि कई स्थानों पर जबरन नसबंदी के आरोप लगे।
महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | विवरण |
| आपातकाल की घोषणा | 25 जून 1975 |
| लागू प्रावधान | अनुच्छेद 352 |
| आधार | आंतरिक अशांति (Internal Disturbance) |
| राष्ट्रपति | फखरुद्दीन अली अहमद |
| प्रधानमंत्री | इंदिरा गांधी |
| समाप्ति | 21 मार्च 1977 |
| प्रमुख आंदोलन | गुजरात नव निर्माण आंदोलन, बिहार आंदोलन, संपूर्ण क्रांति आंदोलन |
मौलिक अधिकारों एवं प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रभाव
आपातकाल (1975–1977) के दौरान भारतीय लोकतंत्र का सबसे अधिक प्रभाव मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) और प्रेस की स्वतंत्रता (Freedom of Press) पर पड़ा।
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मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध
आपातकाल लागू होने के बाद नागरिकों के कई मौलिक अधिकारों के प्रयोग पर रोक लगा दी गई। सरकार ने यह तर्क दिया कि देश की आंतरिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अस्थायी रूप से कुछ अधिकारों को सीमित करना आवश्यक है।
मुख्य प्रभाव—
- नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हुई।
- सरकार के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन सीमित कर दिए गए।
- बड़ी संख्या में राजनीतिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे के हिरासत में लिया गया।
- न्यायालय में जाकर मौलिक अधिकारों की सुरक्षा प्राप्त करना कठिन हो गया।
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मीसा (MISA) का व्यापक उपयोग
मीसा Maintenance of Internal Security Act (MISA) के अंतर्गत सरकार को बिना मुकदमे के व्यक्तियों को हिरासत में रखने का अधिकार प्राप्त था।
आपातकाल के दौरान इसी कानून के तहत हजारों विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, छात्र नेताओं तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।
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प्रेस की स्वतंत्रता पर सेंसरशिप
आपातकाल के दौरान प्रेस पर सरकारी सेंसरशिप लागू कर दी गई। समाचार पत्रों को प्रकाशित करने से पहले सरकारी अधिकारियों से अनुमति लेनी पड़ती थी।
प्रेस पर लगाए गए प्रमुख प्रतिबंध—
- सरकार की आलोचना करने वाले समाचार प्रकाशित नहीं किए जा सकते थे।
- विपक्ष से संबंधित अनेक समाचार रोके गए।
- राजनीतिक कार्टून, लेख और संपादकीय पर नियंत्रण लगाया गया।
- रेडियो और दूरदर्शन पहले से ही सरकारी नियंत्रण में थे।
उस समय अनेक समाचार पत्रों ने सेंसरशिप का विरोध किया, जबकि कुछ ने सरकारी निर्देशों का पालन किया।
- न्यायपालिका की भूमिका
आपातकाल के दौरान न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर भी बहस हुई। विशेष रूप से “हैबियस कॉर्पस” में सर्वोच्च न्यायालय के बहुमत ने सरकार के पक्ष में निर्णय दिया कि आपातकाल के दौरान कुछ परिस्थितियों में नागरिक अदालत में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग नहीं कर सकते।
महत्वपूर्ण संविधान संशोधन
आपातकाल के दौरान और उसके बाद संविधान में कई महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। ये संशोधन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
- 38वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1975
मुख्य उद्देश्य-
- राष्ट्रपति द्वारा घोषित आपातकाल को न्यायिक समीक्षा से लगभग बाहर करना।
- आपातकाल संबंधी “राष्ट्रपति की संतुष्टि” को अंतिम माना गया।
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39वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 (39th Constitutional Amendment Act, 1975)
39वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 भारतीय संविधान का एक महत्वपूर्ण संशोधन था, जिसे आपातकाल (Emergency) के दौरान पारित किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के चुनावों से संबंधित विवादों को सामान्य न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र से बाहर करना था।
पृष्ठभूमि-
1971 के लोकसभा चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi ने Raj Narain को हराया था। राज नारायण ने चुनाव परिणाम को चुनौती देते हुए Allahabad High Court में याचिका दायर की।
12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चुनावी अनियमितताओं के आधार पर इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया और उनके सांसद पद पर रोक लगा दी। इस फैसले के बाद देश में राजनीतिक संकट गहरा गया। इसी पृष्ठभूमि में 39वाँ संविधान संशोधन लाया गया।
प्रमुख प्रावधान-
- संविधान में अनुच्छेद 329A जोड़ा गया।
- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के चुनावों से संबंधित विवादों को सामान्य न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र से बाहर किया गया।
- ऐसे चुनावों के संबंध में निर्णय लेने की व्यवस्था संसद द्वारा बनाए गए विशेष कानूनों के अनुसार की जानी थी।
- इस संशोधन का प्रभाव पूर्व में हुए चुनावों पर भी लागू किया गया, जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री के चुनाव को कानूनी सुरक्षा मिली।
न्यायिक समीक्षा-
बाद में Supreme Court of India ने Indira Nehru Gandhi v. Raj Narain मामले में 39वें संविधान संशोधन के उन प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित किया, जो न्यायिक समीक्षा को समाप्त करते थे। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायिक समीक्षा और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव भारतीय संविधान की “मूल संरचना” (Basic Structure) का हिस्सा हैं और इन्हें समाप्त नहीं किया जा सकता।
-
42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 (42nd Constitutional Amendment Act, 1976)
42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 भारतीय संविधान के इतिहास का सबसे व्यापक और महत्वपूर्ण संशोधन माना जाता है। इसे आपातकाल (1975–1977) के दौरान पारित किया गया था। संविधान के अनेक अनुच्छेदों में बदलाव किए जाने के कारण इसे “मिनी संविधान (Mini Constitution)” भी कहा जाता है।
42वें संविधान संशोधन की पृष्ठभूमि
1975 में आपातकाल लागू होने के बाद केंद्र सरकार ने संविधान में व्यापक संशोधन करने का निर्णय लिया। सरकार का मानना था कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन तेज़ी से लागू करने के लिए संविधान में बदलाव आवश्यक हैं।
42वें संविधान संशोधन की प्रमुख विशेषताएँ
- संविधान की प्रस्तावना (Preamble) में परिवर्तन
42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में तीन नए शब्द जोड़े गए—
- समाजवादी (Socialist)
- पंथनिरपेक्ष (Secular)
- अखंडता (Integrity)
इसके बाद प्रस्तावना इस प्रकार हो गई—
“सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य”
- मौलिक कर्तव्यों (Fundamental Duties) को जोड़ा गया
42वें संशोधन द्वारा संविधान में भाग 4 क (भाग- 4 क) जोड़ा गया तथा अनुच्छेद 51क के अंतर्गत नागरिकों के 10 मौलिक कर्तव्यों को शामिल किया गया (बाद में 86वें संविधान संशोधन, 2002 द्वारा 11वाँ कर्तव्य जोड़ा गया) ।
इनका उद्देश्य – नागरिकों में संविधान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान, पर्यावरण संरक्षण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करना था।
- संसद की शक्तियों में वृद्धि
इस संशोधन द्वारा संसद की शक्तियों को और अधिक व्यापक बनाया गया।
- संसद की संशोधन शक्ति को मजबूत करने का प्रयास किया गया।
- संविधान संशोधनों की न्यायिक समीक्षा को सीमित करने का प्रयास किया गया।
- न्यायपालिका की शक्तियों पर प्रभाव
42वें संशोधन द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कुछ शक्तियों को सीमित करने का प्रयास किया गया।
मुख्य उद्देश्य था कि संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को न्यायालय आसानी से असंवैधानिक घोषित न कर सके।
हालाँकि बाद में न्यायपालिका ने मूल संरचना (Basic Structure) सिद्धांत के आधार पर इन प्रावधानों की समीक्षा की।
- नीति-निर्देशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) को अधिक महत्व
42वें संशोधन ने राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों को अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास किया।
इसका उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक न्याय को बढ़ावा देना था।
- केंद्र सरकार की शक्तियों में वृद्धि
इस संशोधन से केंद्र सरकार की भूमिका अपेक्षाकृत अधिक मजबूत हुई।
- लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल
42वें संशोधन द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया गया। बाद में 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा इसे पुनः 5 वर्ष कर दिया गया।
-
44वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 (44th Constitutional Amendment Act, 1978)
44वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन है। यह संशोधन जनता पार्टी सरकार द्वारा आपातकाल (1975–1977) के अनुभवों के बाद पारित किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा, लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ करना तथा भविष्य में आपातकाल के दुरुपयोग की संभावना को कम करना था।
44वें संविधान संशोधन की पृष्ठभूमि –
1975 से 1977 के बीच लागू आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं, प्रेस की आज़ादी और न्यायपालिका की भूमिका को लेकर व्यापक बहस हुई। 1977 के आम चुनाव में जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता परिवर्तन किया और जनता पार्टी की सरकार बनी।
नई सरकार का मानना था कि संविधान में ऐसे प्रावधान होने चाहिए जो भविष्य में आपातकाल के दुरुपयोग को रोक सकें। इसी उद्देश्य से 1978 में 44वाँ संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया।
44वें संविधान संशोधन की प्रमुख विशेषताएँ
- आपातकाल घोषित करने की शर्तें अधिक कठोर बनाई गईं
44वें संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान राष्ट्रीय आपातकाल से संबंधित था।
- अनुच्छेद 352 में “आंतरिक अशांति (Internal Disturbance)” शब्द हटाकर “सशस्त्र विद्रोह (Armed Rebellion)” शब्द जोड़ा गया।
- इससे केवल सामान्य राजनीतिक अस्थिरता के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करना संभव नहीं रहा।
- मंत्रिपरिषद की लिखित सलाह अनिवार्य
- अब राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल तभी घोषित कर सकते हैं, जब प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद लिखित रूप में इसकी सलाह दे।
- इस प्रावधान का उद्देश्य निर्णय प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनाना था।
- संसद की स्वीकृति को अधिक महत्व
आपातकाल की घोषणा के बाद उसे संसद की स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक बनाया गया।
यदि संसद स्वीकृति नहीं देती, तो आपातकाल स्वतः समाप्त हो जाएगा।
- मौलिक अधिकारों की बेहतर सुरक्षा
44वें संशोधन ने नागरिक स्वतंत्रताओं को अधिक मजबूत बनाया।
विशेष रूप से—
- अनुच्छेद 20 (दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण)
- अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार)
इन अधिकारों को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी समाप्त नहीं किया जा सकता। यह भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था मानी जाती है।
- लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल
- 42वें संविधान संशोधन द्वारा लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 6 वर्ष कर दिया गया था।
- 44वें संशोधन ने इसे पुनः 5 वर्ष कर दिया।
- संपत्ति के अधिकार में परिवर्तन
- 44वें संविधान संशोधन द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटाकर संवैधानिक/कानूनी अधिकार बना दिया गया।
- अब यह अनुच्छेद 300A के अंतर्गत एक वैधानिक (Legal/Constitutional) अधिकार है, न कि मौलिक अधिकार।
1977 का आम चुनाव एवं लोकतंत्र की पुनर्स्थापना
जनवरी 1977 में प्रधानमंत्री Indira Gandhi ने लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा की। मार्च 1977 में हुए आम चुनाव स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण चुनावों में से एक माने जाते हैं।
चुनाव परिणाम
- उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में कांग्रेस को भारी पराजय मिली।
- जनता पार्टी ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया।
- पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।
- मोरारजी देशाई भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।
जनता पार्टी सरकार की चुनौतियाँ
- विभिन्न विचारधाराओं वाले दलों को एक साथ रखना।
- आर्थिक समस्याओं का समाधान।
- आपातकाल के दौरान किए गए निर्णयों की समीक्षा।
- लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का विश्वास पुनः स्थापित करना।
आंतरिक मतभेदों के कारण जनता पार्टी सरकार अधिक समय तक नहीं चल सकी।
महत्वपूर्ण तथ्य –
| विषय | तथ्य |
| राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा | 25 जून 1975 |
| समाप्ति | 21 मार्च 1977 |
| प्रधानमंत्री | इंदिरा गांधी |
| राष्ट्रपति | फखरुद्दीन अली अहमद |
| प्रमुख आंदोलन | गुजरात नव निर्माण, बिहार आंदोलन, संपूर्ण क्रांति |
| प्रमुख नेता | जयप्रकाश नारायण |
| 42वाँ संशोधन | 1976 (मिनी संविधान) |
| 44वाँ संशोधन | 1978 (लोकतांत्रिक सुरक्षा को मजबूत किया) |
| 1977 चुनाव | पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन |
| प्रथम गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री | मोरारजी देसाई |
महत्वपूर्ण आंदोलन
गुजरात नव निर्माण आंदोलन (1974)
| बिंदु | विवरण |
| आंदोलन का नाम | गुजरात नव निर्माण आंदोलन |
| वर्ष | 1974 |
| शुरुआत | छात्रों के आंदोलन से |
| प्रमुख कारण | महँगाई, भ्रष्टाचार, हॉस्टल फीस वृद्धि |
| तत्कालीन मुख्यमंत्री | चिमनभाई पटेल |
| परिणाम | मुख्यमंत्री का इस्तीफा और विधानसभा भंग |
| महत्व | बिहार आंदोलन और राष्ट्रीय विपक्षी आंदोलन को प्रेरणा मिली |
बिहार छात्र आंदोलन (1974)
बिहार छात्र आंदोलन (Bihar Student Movement) वर्ष 1974 में शुरू हुआ एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक जन आंदोलन था। इसकी शुरुआत छात्रों द्वारा महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं के विरोध से हुई।
बाद में यह आंदोलन पूरे राज्य में फैल गया और राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े राजनीतिक आंदोलन का रूप ले लिया। आगे चलकर 1975 के राष्ट्रीय आपातकाल (Emergency) की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बिहार छात्र संघर्ष समिति ने प्रसिद्ध समाजवादी नेता – जयप्रकाश नारायण (जेपी) से आंदोलन का नेतृत्व करने का अनुरोध किया। छात्रों के आग्रह पर उन्होंने आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया। उन्होंने आंदोलन को शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक बनाए रखने पर बल दिया तथा “संपूर्ण क्रांति (Total Revolution)” का नारा दिया।
महत्वपूर्ण तथ्य –
| बिंदु | विवरण |
| आंदोलन का नाम | बिहार छात्र आंदोलन |
| वर्ष | 1974 |
| प्रमुख संगठन | बिहार छात्र संघर्ष समिति |
| प्रमुख नेता | जयप्रकाश नारायण (जेपी) |
| मुख्य कारण | महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और शिक्षा सुधार |
| प्रमुख नारा | संपूर्ण क्रांति (Total Revolution) |
| महत्व | राष्ट्रीय विपक्षी आंदोलन को गति मिली और आपातकाल की पृष्ठभूमि बनी |
संपूर्ण क्रांति (Total Revolution)
भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन था, जिसका नेतृत्व प्रसिद्ध समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने वर्ष 1974 में किया।
“संपूर्ण क्रांति” का अर्थ है—समाज के प्रत्येक क्षेत्र में शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और नैतिक परिवर्तन। उनका उद्देश्य – लोकतंत्र को अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी और जन-केंद्रित बनाना था
महत्वपूर्ण तथ्य –
| बिंदु | विवरण |
| आंदोलन का नाम | संपूर्ण क्रांति (Total Revolution) |
| वर्ष | 1974 |
| प्रमुख नेता | जयप्रकाश नारायण (जेपी) |
| प्रमुख आधार | बिहार छात्र आंदोलन |
| मुख्य उद्देश्य | राजनीति, समाज, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और प्रशासन में व्यापक सुधार |
| आंदोलन का स्वरूप | अहिंसक एवं लोकतांत्रिक |
| प्रमुख प्रभाव | विपक्ष की एकता, लोकतांत्रिक जागरूकता और आपातकाल की पृष्ठभूमि |
निष्कर्ष (Conclusion)
“लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट” भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। यह केवल 1975–77 के आपातकाल की घटनाओं का वर्णन नहीं करता, बल्कि यह भी बताता है कि लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों पर नहीं, बल्कि संविधान, मौलिक अधिकारों, स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रेस और सक्रिय विपक्ष जैसी संस्थाओं की मजबूती पर निर्भर करती है।
आपातकाल ने भारतीय लोकतंत्र की सीमाओं और चुनौतियों को उजागर किया, वहीं 1977 के आम चुनाव ने यह सिद्ध किया कि भारत के मतदाता लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सजग हैं और शांतिपूर्ण ढंग से सत्ता परिवर्तन करने की क्षमता रखते हैं। इसके बाद किए गए 44वें संविधान संशोधन ने भविष्य में लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा को और अधिक सुदृढ़ बनाया।
Frequently Asked Questions (FAQs)
प्रश्न – 1. भारत में आपातकाल कब घोषित किया गया?
उत्तर- 25 जून 1975 को।
प्रश्न -2. आपातकाल कब समाप्त हुआ?
उत्तर- 21 मार्च 1977 को।
प्रश्न -3. आपातकाल किस अनुच्छेद के अंतर्गत घोषित किया गया?
उत्तर- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत।
प्रश्न -4. उस समय भारत के प्रधानमंत्री कौन थे?
उत्तर- इंदिरा गांधी।
प्रश्न -5. उस समय भारत के राष्ट्रपति कौन थे?
उत्तर- फखरुद्दीन अली अहमद।
प्रश्न -6. संपूर्ण क्रांति आंदोलन का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर- जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने।
प्रश्न -7. गुजरात नव निर्माण आंदोलन कब शुरू हुआ?
उत्तर- 1974 में।
प्रश्न -8. बिहार आंदोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर- भ्रष्टाचार, महँगाई और बेरोज़गारी के विरुद्ध जन आंदोलन।
प्रश्न -9. आपातकाल के दौरान प्रेस पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर- प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई और समाचारों की सरकारी जाँच की जाने लगी।
प्रश्न -10. MISA क्या था?
उत्तर- Maintenance of Internal Security Act, जिसके अंतर्गत बिना मुकदमे के गिरफ्तारी की जा सकती थी।
प्रश्न -11. 42वें संविधान संशोधन को क्या कहा जाता है?
उत्तर- “Mini Constitution” (मिनी संविधान)।
प्रश्न -12. 42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में कौन-से शब्द जोड़े गए?
उत्तर- समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता।
प्रश्न -13. 44वें संविधान संशोधन का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर- लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा को मजबूत करना और भविष्य में आपातकाल घोषित करने की प्रक्रिया को अधिक कठोर बनाना।
प्रश्न -14. 1977 के चुनाव का क्या महत्व था?
उत्तर- पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।
प्रश्न -15. भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री कौन बने?
उत्तर- मोरारजी देसाई।