भारत के विदेश संबंध (India’s External Relations)
परिचय
15 अगस्त 1947 को आज़ाद होने के बाद भारत ने ऐसी विदेश नीति अपनाई जो राष्ट्रीय हितों, विश्व शांति, समानता तथा उपनिवेशवाद के विरोध पर आधारित थी।
भारत की विदेश नीति का निर्माण तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में हुआ। नेहरू का मानना था कि भारत किसी भी महाशक्ति का अनुयायी बनने के बजाय अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाएगा।
आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं और प्रभावशाली देशों में गिना जाता है। इसकी नींव स्वतंत्रता के बाद अपनाई गई संतुलित विदेश नीति में निहित है।
शीत युद्ध की पृष्ठभूमि (Background of the Cold War)
द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) के समाप्त होने के बाद विश्व दो प्रमुख गुटों में विभाजित हो गया। –
- पहला गुट संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के नेतृत्व में था।
- दूसरा गुट सोवियत संघ (USSR) के नेतृत्व में था।
इन दोनों महाशक्तियों के बीच प्रत्यक्ष युद्ध नहीं हुआ, लेकिन राजनीतिक, आर्थिक, वैचारिक तथा सैन्य प्रतिस्पर्धा लगातार चलती रही। इसी स्थिति को शीत युद्ध (Cold War) कहा गया।
शीत युद्ध के दौरान अधिकांश नवस्वतंत्र देशों पर किसी एक गुट में शामिल होने का दबाव था। भारत ने इस दबाव को स्वीकार नहीं किया और स्वतंत्र निर्णय लेने की नीति अपनाई।
भारत की विदेश नीति क्या है?
विदेश नीति (Foreign Policy) से आशय उन सिद्धांतों, उद्देश्यों और निर्णयों से है जिनके आधार पर कोई देश अन्य देशों के साथ अपने संबंध स्थापित करता है।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने ऐसी विदेश नीति अपनाई जो निम्नलिखित मूल्यों पर आधारित थी—
- राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा
- विश्व शांति को बढ़ावा
- सभी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध
- उपनिवेशवाद और नस्लभेद का विरोध
- अंतरराष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान
- स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता
भारत की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य (Objectives of India’s Foreign Policy)
भारत की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए विश्व समुदाय के साथ मैत्रीपूर्ण और संतुलित संबंध स्थापित करना है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने ऐसी विदेश नीति अपनाई जो राष्ट्रीय संप्रभुता, विश्व शांति, समानता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के सिद्धांतों पर आधारित थी। –
- राष्ट्रीय सुरक्षा एवं संप्रभुता की रक्षा
- राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा
- विश्व शांति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना।
- स्वतंत्र विदेश नीति अपनाना
- आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना
- उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का विरोध
- नस्लभेद (Apartheid) का विरोध
- संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों में विश्वास
- विकासशील देशों के साथ सहयोग बढ़ाना
- वैश्विक निरस्त्रीकरण का समर्थन
गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement – NAM)
शीत युद्ध के दौरान अधिकांश देशों ने अमेरिका या सोवियत संघ का साथ चुना, लेकिन भारत ने किसी भी सैन्य गुट में शामिल होने से इनकार कर दिया। इसी नीति को गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) कहा जाता है।
गुटनिरपेक्षता का अर्थ तटस्थ रहना नहीं था, बल्कि प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेना था।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना 1961 में हुई।
- इसके प्रमुख नेताओं में जवाहरलाल नेहरू (भारत), जोसिप ब्रोज़ टीटो (यूगोस्लाविया), गमाल अब्देल नासिर (मिस्र), सुकर्णो (इंडोनेशिया) और क्वामे नक्रूमा (घाना) शामिल थे।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रमुख उद्देश्य
- स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखना।
- किसी सैन्य गुट का हिस्सा न बनना।
- विश्व शांति को बढ़ावा देना।
- नवस्वतंत्र देशों के हितों की रक्षा करना।
- उपनिवेशवाद का विरोध करना।
पंचशील के पाँच सिद्धांत
भारत और चीन के बीच 1954 में हुए समझौते के आधार पर पंचशील सिद्धांत प्रस्तुत किए गए। इनका उद्देश्य देशों के बीच शांतिपूर्ण और सम्मानजनक संबंध स्थापित करना था।
- एक-दूसरे की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान।
- परस्पर अनाक्रमण (एक-दूसरे पर आक्रमण न करना)।
- एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
- समानता एवं पारस्परिक लाभ।
- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।
एशिया-अफ्रीका सम्मेलन (बांडुंग सम्मेलन)
1955 में इंडोनेशिया के बांडुंग (Bandung) शहर में एशियाई और अफ्रीकी देशों का ऐतिहासिक सम्मेलन आयोजित हुआ। इस सम्मेलन का उद्देश्य था—
- नवस्वतंत्र देशों के बीच सहयोग बढ़ाना।
- उपनिवेशवाद का विरोध करना।
- आर्थिक एवं सांस्कृतिक सहयोग को प्रोत्साहित करना।
- विश्व शांति और समानता को बढ़ावा देना।
महत्वपूर्ण तथ्य –
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विषय |
महत्वपूर्ण तथ्य |
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भारत स्वतंत्र हुआ |
15 अगस्त 1947 |
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शीत युद्ध |
1945–1991 |
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पंचशील समझौता |
1954 |
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बांडुंग सम्मेलन |
1955, इंडोनेशिया |
| गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) |
1961 |
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विदेश नीति के प्रमुख निर्माता |
जवाहरलाल नेहरू |
| विदेश नीति का मूल आधार |
स्वतंत्र निर्णय, विश्व शांति और राष्ट्रीय हित |
भारत-चीन संबंध (India–China Relations)
भारत और चीन के संबंध प्रारंभिक वर्षों में मैत्रीपूर्ण थे। दोनों देश एशिया के नवस्वतंत्र राष्ट्र थे और उपनिवेशवाद के विरोधी थे। भारत ने 1949 में चीन की नई सरकार (People’s Republic of China) को मान्यता देने वाले प्रारंभिक देशों में स्थान प्राप्त किया।
1954 में भारत और चीन के बीच पंचशील समझौता हुआ, जिसने दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा दी। इसी समय “हिंदी-चीनी भाई-भाई” का नारा भी लोकप्रिय हुआ।
हालाँकि, कुछ वर्षों बाद दोनों देशों के बीच सीमा विवाद उभरने लगे। मुख्य विवाद दो क्षेत्रों को लेकर था—
- अक्साई चिन (लद्दाख क्षेत्र)
- नेफा (NEFA – वर्तमान अरुणाचल प्रदेश)
सीमा निर्धारण को लेकर दोनों देशों के विचार अलग-अलग थे। धीरे-धीरे विश्वास की जगह तनाव ने ले ली।
1962 का भारत-चीन युद्ध
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद बढ़ने के कारण अक्टूबर 1962 में युद्ध छिड़ गया। यह युद्ध भारत के लिए एक गंभीर चुनौती साबित हुआ।
कारण –
- अक्साई चिन पर चीन का नियंत्रण।
- मैकमोहन रेखा (McMahon Line) को लेकर मतभेद।
- सीमा क्षेत्रों में बढ़ती सैन्य गतिविधियाँ।
- दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी।
परिणाम –
युद्ध का भारत की विदेश नीति पर प्रभाव
1962 के युद्ध ने भारत को अपनी सुरक्षा नीति पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद—
- सेना के आधुनिकीकरण पर अधिक ध्यान दिया गया।
- रक्षा बजट में वृद्धि की गई।
- सीमाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई।
- विदेश नीति में आदर्शवाद के साथ-साथ व्यावहारिक दृष्टिकोण भी अपनाया गया।
भारत-पाकिस्तान संबंध (India–Pakistan Relations)
भारत और पाकिस्तान का जन्म 1947 में विभाजन के साथ हुआ। विभाजन के समय कई राजनीतिक और क्षेत्रीय विवाद उत्पन्न हुए, जिनमें सबसे प्रमुख जम्मू-कश्मीर का प्रश्न था।
दोनों देशों के बीच संबंध प्रारंभ से ही तनावपूर्ण रहे। समय-समय पर विभिन्न मुद्दों पर मतभेद उत्पन्न हुए, जिनमें प्रमुख हैं—
- जम्मू-कश्मीर विवाद
- सीमावर्ती क्षेत्र
- शरणार्थियों की समस्या
- जल संसाधनों से संबंधित मुद्दे
1965 का भारत-पाक युद्ध
1965 में जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच दूसरा बड़ा युद्ध हुआ।
युद्ध के कारण
- पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में घुसपैठ का प्रयास।
- सीमा पर बढ़ता सैन्य तनाव।
युद्ध का परिणाम
संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप के बाद युद्धविराम हुआ। इसके बाद 1966 में ताशकंद समझौता हुआ, जिसमें दोनों देशों ने शांति बनाए रखने और विवादों को बातचीत से सुलझाने पर सहमति व्यक्त की।
यद्यपि ताशकंद समझौता इस अध्याय का मुख्य विषय नहीं है, NCERT इसे भारत-पाक संबंधों के महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में उल्लेखित करती है।
1971 का भारत-पाक युद्ध एवं बांग्लादेश का निर्माण
1971 का युद्ध भारतीय विदेश नीति के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जाता है।
उस समय पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में राजनीतिक संकट उत्पन्न हुआ। आम चुनावों के बाद भी वहाँ की जनता को सत्ता नहीं सौंपी गई, जिसके कारण व्यापक असंतोष और हिंसा फैल गई।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि लाखों शरणार्थी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में आने लगे। इससे भारत पर सामाजिक, आर्थिक और मानवीय दबाव बढ़ गया।
भारत ने पहले कूटनीतिक समाधान का प्रयास किया, लेकिन परिस्थितियाँ अनुकूल न होने पर दिसंबर 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हुआ।
युद्ध का परिणाम
- पाकिस्तान की सेना ने आत्मसमर्पण किया।
- 16 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया।
- भारत की सैन्य एवं कूटनीतिक क्षमता की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई।
शिमला समझौता (1972)
1971 के युद्ध के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच 2 जुलाई 1972 को शिमला समझौता हुआ।
इस समझौते पर भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने हस्ताक्षर किए।
- दोनों देश अपने विवादों का समाधान द्विपक्षीय वार्ता से करेंगे।
- युद्धविराम रेखा को लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) का स्वरूप दिया गया।
- दोनों देशों ने शांति और सहयोग बनाए रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
- भविष्य में बल प्रयोग के बजाय बातचीत को प्राथमिकता देने पर सहमति बनी।
महत्वपूर्ण तथ्य –
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विषय |
महत्वपूर्ण तथ्य |
| चीन को भारत की मान्यता |
1949 |
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पंचशील समझौता |
1954 |
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भारत-चीन युद्ध |
1962 |
| भारत-पाक युद्ध |
1965 |
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ताशकंद समझौता |
1966 |
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भारत-पाक युद्ध |
1971 |
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बांग्लादेश की स्वतंत्रता |
16 दिसंबर 1971 |
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शिमला समझौता |
2 जुलाई 1972 |
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शिमला समझौते के हस्ताक्षरकर्ता |
इंदिरा गांधी एवं जुल्फिकार अली भुट्टो |
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LoC की अवधारणा |
शिमला समझौते के बाद |
भारत की परमाणु नीति (India’s Nuclear Policy)
स्वतंत्रता के बाद भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के शांतिपूर्ण उपयोग पर विशेष बल दिया। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारत का उद्देश्य मुख्यतः ऊर्जा उत्पादन, कृषि, चिकित्सा तथा वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना था। साथ ही, भारत ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित परमाणु नीति अपनाई।
भारत की परमाणु नीति के प्रमुख उद्देश्य—
- राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग।
- वैश्विक निरस्त्रीकरण का समर्थन।
- किसी भी प्रकार की परमाणु धमकी से देश की रक्षा करना।
- स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखना।
1974 का पोखरण परमाणु परीक्षण
भारत ने 18 मई 1974 को राजस्थान के पोखरण में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया। इस परीक्षण का आधिकारिक नाम “Smiling Buddha” था। भारत सरकार ने इसे शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट (Peaceful Nuclear Explosion) बताया।
पोखरण परीक्षण का महत्व
- भारत ने परमाणु विज्ञान में अपनी तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन किया।
- राष्ट्रीय सुरक्षा को नई मजबूती मिली।
- भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।
- विश्व के कई देशों ने इस परीक्षण पर चिंता व्यक्त की, लेकिन भारत ने इसे अपनी सुरक्षा और वैज्ञानिक विकास के लिए आवश्यक बताया।
परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर भारत का दृष्टिकोण
“परमाणु अप्रसार संधि” (Nuclear Non-Proliferation Treaty – NPT) का उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना था। भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए।
भारत द्वारा NPT पर हस्ताक्षर न करने के कारण
- भारत का मानना था कि यह संधि भेदभावपूर्ण (Discriminatory) है।
- संधि कुछ देशों को परमाणु हथियार रखने की अनुमति देती है, जबकि अन्य देशों पर प्रतिबंध लगाती है।
- भारत सभी देशों के लिए समान नियमों पर आधारित पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण का समर्थक था।
- भारत का विश्वास था कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े निर्णय स्वतंत्र रूप से लिए जाने चाहिए।
- भारत परमाणु हथियारों की दौड़ का समर्थक नहीं था, बल्कि समानता और सार्वभौमिक निरस्त्रीकरण की नीति का पक्षधर था।
महत्वपूर्ण FAQs
प्रश्न – 1. भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्माता कौन थे?
उत्तर: जवाहरलाल नेहरू।
प्रश्न – 2. गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना कब हुई?
उत्तर: 1961 में।
प्रश्न – 3. पंचशील समझौता कब हुआ?
उत्तर: 1954 में।
प्रश्न – 4. बांडुंग सम्मेलन कहाँ आयोजित हुआ?
उत्तर: इंडोनेशिया के बांडुंग शहर में।
प्रश्न – 5. भारत-चीन युद्ध कब हुआ?
उत्तर: 1962 में।
प्रश्न – 6. भारत-पाकिस्तान के बीच दूसरा युद्ध कब हुआ?
उत्तर: 1965 में।
प्रश्न – 7. बांग्लादेश कब स्वतंत्र हुआ?
उत्तर: 16 दिसंबर 1971।
प्रश्न – 8. शिमला समझौता कब हुआ?
उत्तर: 2 जुलाई 1972।
प्रश्न – 9. भारत का पहला परमाणु परीक्षण कहाँ हुआ?
उत्तर: पोखरण (राजस्थान)।
प्रश्न – 10. पोखरण परीक्षण कब हुआ?
उत्तर: 18 मई 1974।
प्रश्न – 11. भारत ने NPT पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए?
उत्तर: क्योंकि भारत इसे भेदभावपूर्ण संधि मानता था।
प्रश्न – 12. पंचशील के पाँच सिद्धांत किससे संबंधित हैं?
उत्तर: देशों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व से।
प्रश्न – 13. विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: राष्ट्रीय हितों की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का संचालन।
प्रश्न – 14. गुटनिरपेक्षता का अर्थ क्या है?
उत्तर: किसी सैन्य गुट में शामिल हुए बिना स्वतंत्र निर्णय लेना।
निष्कर्ष
स्वतंत्रता के बाद भारत ने ऐसी विदेश नीति विकसित की जो राष्ट्रीय हित, रणनीतिक स्वायत्तता, विश्व शांति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर आधारित थी। गुटनिरपेक्ष आंदोलन, पंचशील, बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में भूमिका तथा परमाणु नीति जैसे निर्णयों ने भारत को वैश्विक स्तर पर एक जिम्मेदार और स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।