मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्वों में संबंध
भारतीय संविधान जो की 26 जनवरी, 1950 को संपूर्ण भारत वर्ष में लागू कर दिया गया था मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निर्देशक तत्वों यह दो महत्वपूर्ण स्तंभ आधारित है मौलिक अधिकार नागरिकों को राज्य के विरुद्ध कुछ अनुचित आचरण से बचने के लिए प्रदान किए गए थे
वहीं राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को सामाजिक एवं आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक मार्गदर्शन के रूप में रखे गए थे इन दोनों के बीच संबंधों को संविधान निर्माताओं के सामने एक जटिल मुद्दा था जिसकी बाद में विभिन्न व्याख्याएं, न्यायिक हस्तक्षेप हुए एवं हाल ही के वर्षों में विशेष रूप से सामाजिक न्याय और समावेशिता पर बढ़ते जोडर के साथ इन दोनों के संबंधों का फिर से मूल्यांकन किया जा रहा है |
मौलिक अधिकार एवं नीति निर्देशक तत्वों की पृष्ठभूमि
मौलिक अधिकार भारतीय संविधान के भाग-3 में निहित हैं जो कि अनुच्छेद 12 से 35 तक दिए गए हैं | यह अधिकार नागरिकों को राज्य की कार्यवाही से सुरक्षा प्रदान करते हैं इसमें समानता,स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध अधिकार,धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार,शिक्षा और संस्कृति का अधिकार एवं संवैधानिक उपचारों का अधिकार प्रदान किया गया है |
नीति निर्देशक तत्व जो कि संविधान के भाग-4 में निहित है अनुच्छेद 36 से 51 तक वर्णित हैं यह वह निर्देश हैं जो सरकार को नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए मार्गदर्शन करते हैं इनमें ग़रीबी और असमानता को कम करने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देने और पर्यावरण की रक्षा करने जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्य शामिल हैं हालांकि नीति निर्देशक तत्व कानूनी रूप से परिवर्तनीय नहीं है लेकिन सरकार को नीति निर्माण में इनका पालन अवश्य करना होता है |
मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्वों की प्रारंभिक स्थिति
हालांकि शुरुआत में मौलिक अधिकार एवं नीति निर्देशक तत्वों की प्रारंभिक स्थिति के अंतर्गत मौलिक अधिकारों को राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के ऊपर माना गया था यदि कोई कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता था तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता था |
केशवानंद भारती मामला 1973 और मूल संरचना का सिद्धांत
केशवानंद भारती (1973) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय संविधान के मूल संरचना के सिद्धांत को विकसित किया इस सिद्धांत का अनुसार संविधान में मूलभूत विशेषताएं हैं जिन्हें भारतीय संविधान में संशोधन द्वारा नष्ट नहीं किया जा सकता |
इस सिद्धांत को मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के बीच संबंधों को स्पष्ट कर दिया है, न्यायालय कहा है कि राज्य के नीति निर्देशक तत्व, मौलिक अधिकारों को नियंत्रित नहीं कर सकते लेकिन वह नीति निर्माण में मार्गदर्शन कर सकते हैं |
संविधान की सर्वोच्चता एवं मिनर्वा मिल्स मामला 1980
मिनर्वा मिल्स मामला में न्यायालय ने एक फैसला सुनाया था कि संविधान सर्वोच्च है और मौलिक अधिकार एवं नीति निर्देशक तत्व दोनों ही संविधान के अधीन है न्यायालय ने संवैधानिक संतुलन के सिद्धांत को भी रेखांकित किया, जिसके अनुसार मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है |
मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्वों में अंतर
दोनों के अंतर को निम्नलिखित बिंदुओं में देखा जा सकता है –
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क्र.सं. |
मौलिक अधिकार | नीति निर्देशक तत्व |
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1 |
मौलिक अधिकारों को भारतीय संविधान के भाग-3 में दर्शाया गया है जो कि अनुच्छेद 12 से 35 तक दिए गए हैं, |
नीति निर्देशक तत्वों को भारतीय संविधान के भाग-4 में दर्शाया गया है जो की 36 से 51 तक है |
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2 |
मौलिक अधिकारों को कानूनी सहयोग प्राप्त होता है अर्थात मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर आप न्यायालय में जा सकते हैं | |
राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को कानूनी सहायता प्राप्त नहीं होती है| नीति निर्देशक तत्वों के उल्लंघन पर आप न्यायालय में नहीं जा सकते |
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3 |
मौलिक अधिकारों का संबंध व्यक्तियों से होता है | |
नीति निर्देशक तत्वों का संबंध समाज से होता है |
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4 |
मौलिक अधिकार प्राप्त किया जा चुके हैं | |
नीति निर्देशक तत्वों को अभी लागू नहीं किया गया है |
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5 |
मौलिक अधिकारों का उद्देश्य देश में राजनीतिक, लोकतंत्र की स्थापना करना है | |
नीति निर्देशक तत्वों का उद्देश्य देश में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना है |
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| 6 | मौलिक अधिकार व्यक्ति के कल्याण को बढ़ावा देते हैं | |
नीति निर्देशक तत्व समुदाय के कल्याण को बढ़ावा देते हैं |
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मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्वों की वर्तमान स्थिति एवं चुनोतियाँ
वर्तमान भारतीय परिदृश्य में मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के बीच संबंध जटिल और गतिशील है न्यायालय इन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है सामाजिक न्याय और समावेशित पर बढ़ते जोड़ के कारण राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को अधिक महत्व दिया जा रहा है |
जैसे- सूचना का अधिकार अधिनियम 2005, पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए नीति निर्देशक तत्वों के अनुरूप हैं लेकिन मौलिक अधिकार के रूप में भी कार्य करता है |
निष्कर्ष
मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक तत्व भारतीय संविधान के दो महत्वपूर्ण पहलू है, दोनों के बीच संबंध गतिशील रहा है और न्यायालय ने समय-समय पर इन संबंधों को स्पष्ट भी किया है केशवानंद भारती और मिनर्वा मिल्स जैसे महत्वपूर्ण निर्णय ने इन दोनों के बीच संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है भविष्य में इन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना और सामाजिक न्याय एवं समावेशिता को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण होगा |