पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन NCERT Class 12 Political Science Notes in Hindi
भूमिका (Introduction)
मुख्य उद्देश्य यह समझाना है कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण केवल राष्ट्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक जिम्मेदारी भी है। यह अध्याय बताता है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए तथा विभिन्न देशों की भूमिका इस दिशा में क्यों महत्वपूर्ण है।
पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की अवधारणा
पर्यावरण वह समग्र परिवेश है जिसमें मनुष्य, पशु-पक्षी, पौधे और अन्य जीव रहते हैं। इसमें वायु, जल, भूमि, वन, पर्वत, महासागर, जलवायु और जैव विविधता जैसे सभी प्राकृतिक तत्व शामिल हैं।
दूसरी ओर, प्राकृतिक संसाधन वे संसाधन हैं जो हमें प्रकृति से प्राप्त होते हैं और जिनका उपयोग मानव जीवन तथा आर्थिक विकास के लिए किया जाता है। इनमें जल, वन, खनिज, मिट्टी, सूर्य ऊर्जा और जीवाश्म ईंधन प्रमुख हैं।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण सतत विकास (Sustainable Development) की आधारशिला माना जाता है। इसलिए विकास योजनाओं में पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन महत्वपूर्ण माना जाता है।
वैश्विक महत्व
बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से पर्यावरणीय समस्याएँ अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आने लगीं। पहले यह माना जाता था कि पर्यावरण केवल किसी एक देश का आंतरिक विषय है, लेकिन धीरे-धीरे स्पष्ट हुआ कि कई पर्यावरणीय चुनौतियाँ सीमाओं से परे (Transboundary) होती हैं।
उदाहरण के लिए—
- वायु प्रदूषण सीमाओं को नहीं पहचानता।
- समुद्री प्रदूषण कई देशों को प्रभावित करता है।
- जलवायु परिवर्तन का असर पूरी पृथ्वी पर दिखाई देता है।
- जैव विविधता का नुकसान वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है।
इसी कारण पर्यावरण संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, समझौते और साझा नीतियाँ आवश्यक मानी जाती हैं।
वैश्विक साझा संपदा (Global Commons)
वैश्विक साझा संपदा (Global Commons) वे प्राकृतिक क्षेत्र या संसाधन हैं जो किसी एक देश के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते, बल्कि पूरी मानवता के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं-
- पृथ्वी का वायुमंडल (Atmosphere)
- महासागर (High Seas)
- अंटार्कटिका (Antarctica)
- बाह्य अंतरिक्ष (Outer Space)
इन संसाधनों का उपयोग सभी देशों द्वारा किया जा सकता है, लेकिन उनका संरक्षण भी सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
वैश्विक साझा संपदा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे संसाधनों का उपयोग वर्तमान और भविष्य दोनों पीढ़ियों के हितों को ध्यान में रखकर किया जाए।
अंटार्कटिका (Antarctica)
पृथ्वी का सबसे दक्षिणी महाद्वीप है यह विश्व का सबसे ठंडा, सबसे शुष्क और सबसे तेज़ हवाओं वाला महाद्वीप माना जाता है।
इसका महत्व केवल वैज्ञानिक अनुसंधान तक सीमित नहीं है। यह पृथ्वी की जलवायु प्रणाली को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यहाँ मौजूद विशाल हिमखंड (Ice Sheets) वैश्विक समुद्र-स्तर को प्रभावित करते हैं।
अंटार्कटिक संधि (Antarctic Treaty)
सन् 1959 में Antarctic Treaty पर हस्ताक्षर किए गए, जो 1961 से प्रभावी हुई। इस संधि का उद्देश्य अंटार्कटिका को शांतिपूर्ण और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए सुरक्षित रखना है।
इस संधि के प्रमुख उद्देश्य हैं—
- अंटार्कटिका का सैन्य उपयोग प्रतिबंधित करना।
- वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना।
- पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करना।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना।
विश्व की साझी धरोहर (Common Heritage of Humankind)
अर्थात प्राकृतिक और वैश्विक संसाधन पूरी मानवता की साझा संपत्ति हैं। किसी एक देश को उन पर पूर्ण स्वामित्व का अधिकार नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे संसाधनों का उपयोग—
- शांति के लिए हो,
- सभी देशों के हित में हो,
- भविष्य की पीढ़ियों को ध्यान में रखकर किया जाए।
यह विचार विशेष रूप से गहरे समुद्री क्षेत्रों, अंटार्कटिका और बाह्य अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाता है।
साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियाँ
इसका अर्थ है कि पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी सभी देशों की है, लेकिन सभी देशों की जिम्मेदारी समान नहीं हो सकती।
इस सिद्धांत के पीछे तर्क यह है कि विकसित देशों ने लंबे समय तक औद्योगिकीकरण के दौरान अधिक प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी अधिक किया। दूसरी ओर, विकासशील देशों को अभी भी गरीबी उन्मूलन, औद्योगिक विकास और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करना है। –
- विकसित देशों को उत्सर्जन कम करने में अधिक नेतृत्व करना चाहिए।
- स्वच्छ तकनीक और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने में उनकी बड़ी भूमिका होनी चाहिए।
- विकासशील देशों को भी पर्यावरण संरक्षण करना चाहिए, लेकिन उनकी विकास संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन (Rio Earth Summit) और संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) में महत्वपूर्ण रूप से स्वीकार किया गया और आज भी अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं का आधार माना जाता है।
ओज़ोन परत (Ozone Layer) क्या है?
पृथ्वी के वायुमंडल में समताप मंडल (Stratosphere) की एक परत में ओज़ोन (O₃) गैस अधिक मात्रा में पाई जाती है। इसे ही ओज़ोन परत कहा जाता है।
यह परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (Ultraviolet – UV) किरणों का अधिकांश भाग अवशोषित कर लेती है। यदि यह सुरक्षा कवच न हो, तो पृथ्वी पर जीवन गंभीर खतरे में पड़ सकता है।
ओज़ोन परत के क्षय के कारण
बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में वैज्ञानिकों ने पाया कि ओज़ोन परत पतली होती जा रही है, विशेषकर अंटार्कटिका के ऊपर। इसे सामान्य भाषा में ओज़ोन छिद्र (Ozone Hole) कहा जाता है।
इसका प्रमुख कारण मानव गतिविधियों से निकलने वाले कुछ रासायनिक पदार्थ हैं, जैसे—
- क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs)
- हैलॉन (Halons)
- कार्बन टेट्राक्लोराइड
- मिथाइल क्लोरोफॉर्म
इनका उपयोग पहले रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, एरोसोल स्प्रे और कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं में व्यापक रूप से होता था।
ओज़ोन परत के क्षय के प्रभाव
यदि ओज़ोन परत कमजोर होती है, तो अधिक मात्रा में UV किरणें पृथ्वी तक पहुँचती हैं।
इसके परिणामस्वरूप—
- त्वचा कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
- आँखों में मोतियाबिंद जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं।
- पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है।
- समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार बनने वाले सूक्ष्म जीव (फाइटोप्लैंकटन) प्रभावित हो सकते हैं।
- पारिस्थितिक संतुलन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
ओज़ोन परत के संरक्षण के लिए किए गए वैश्विक प्रयासों के सकारात्मक परिणाम दिखाई दे रहे हैं और यदि वर्तमान प्रतिबद्धताएँ बनी रहीं, तो इस सदी के मध्य या उत्तरार्ध तक कई क्षेत्रों में ओज़ोन परत के पर्याप्त रूप से पुनर्स्थापित होने की संभावना व्यक्त की गई है।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol)
ओज़ोन परत की सुरक्षा के लिए विश्व समुदाय ने 1987 में Montreal Protocol को अपनाया।
इस समझौते का मुख्य उद्देश्य उन रसायनों के उत्पादन और उपयोग को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना था, जो ओज़ोन परत को नुकसान पहुँचाते हैं।
जलवायु परिवर्तन (Climate Change)
आज जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के सामने सबसे गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है। जलवायु परिवर्तन का अर्थ केवल तापमान बढ़ना नहीं है। इसमें मौसम के दीर्घकालिक पैटर्न में होने वाले बदलाव शामिल हैं, जैसे—
- औसत तापमान में वृद्धि
- वर्षा के स्वरूप में परिवर्तन
- सूखा और बाढ़ जैसी चरम घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति
- हिमनदों का पिघलना
- समुद्र के जलस्तर में वृद्धि
ग्रीनहाउस गैसें (Greenhouse Gases)
ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में ऊष्मा को रोकने का कार्य करती हैं। प्राकृतिक मात्रा में ये पृथ्वी को जीवन के अनुकूल तापमान बनाए रखने में सहायता करती हैं, लेकिन इनकी अत्यधिक वृद्धि समस्या बन जाती है।
मुख्य ग्रीनहाउस गैसें हैं—
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)
- मीथेन (CH₄)
- नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O)
- जलवाष्प (Water Vapour)
- फ्लोरीन युक्त गैसें
इन गैसों की मात्रा बढ़ने का प्रमुख कारण है—
- जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग
- वनों की कटाई
- औद्योगिक गतिविधियाँ
- परिवहन
- कुछ कृषि पद्धतियाँ
वैश्विक तापवृद्धि (Global Warming)
जब ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ती है, तो पृथ्वी का औसत तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। इस प्रक्रिया को वैश्विक तापवृद्धि (Global Warming) कहा जाता है।
इसके संभावित प्रभाव—
- ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना
- समुद्र का जलस्तर बढ़ना
- कृषि उत्पादन पर प्रभाव
- जल संकट
- जैव विविधता को नुकसान
- चरम मौसम संबंधी घटनाओं में वृद्धि
जैव विविधता (Biodiversity)
पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी प्रकार के पौधों, जीव-जंतुओं, सूक्ष्मजीवों तथा उनके पारिस्थितिक तंत्रों की विविधता।
यह केवल प्रकृति की सुंदरता का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।
- खाद्य सुरक्षा बनी रहती है।
- औषधीय संसाधन प्राप्त होते हैं।
- कृषि को सहायता मिलती है।
- पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है।
- प्राकृतिक आपदाओं से उबरने की क्षमता मजबूत होती है।
जैव विविधता संरक्षण के अंतरराष्ट्रीय प्रयास
जैव विविधता की रक्षा के लिए कई अंतरराष्ट्रीय पहल की गई हैं। इनमें प्रमुख हैं—
- 1992 का जैव विविधता अभिसमय (Convention on Biological Diversity – CBD), जिसे पृथ्वी सम्मेलन (Rio Earth Summit) में अपनाया गया।
- संरक्षित क्षेत्रों और राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना।
- संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम।
- प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ उपयोग को बढ़ावा देना।
इन प्रयासों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विकास के साथ-साथ प्रकृति का संतुलन भी बना रहे।
सतत विकास (Sustainable Development)
पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन बनाने की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा सतत विकास (Sustainable Development) है। अर्थात ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करे, लेकिन भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं और संसाधनों से समझौता न करे।
इस अवधारणा का उद्देश्य केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक न्याय और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को भी सुनिश्चित करना है।
- वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना।
- सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों का उपयोग।
- वनों का संरक्षण और पुनर्वनीकरण।
- जल और ऊर्जा की बचत।
- प्रदूषण नियंत्रण के प्रभावी उपाय।
नर्मदा बचाओ आंदोलन
नर्मदा बचाओ आंदोलन (Narmada Bachao Andolan) भारत के प्रमुख पर्यावरणीय और सामाजिक आंदोलनों में से एक है।
इस आंदोलन में सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्थानीय समुदायों, पर्यावरणविदों और विभिन्न संगठनों ने भाग लिया। आंदोलन का उद्देश्य विकास का विरोध करना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि विकास परियोजनाओं से प्रभावित लोगों के अधिकारों की रक्षा हो और पर्यावरणीय प्रभावों का उचित आकलन किया जाए।
क्या विकास केवल बड़े बाँध और उद्योग स्थापित करने से होगा, या विकास में लोगों के अधिकार, पर्यावरण संरक्षण और न्यायपूर्ण पुनर्वास भी शामिल होना चाहिए?
इसी कारण नर्मदा बचाओ आंदोलन भारतीय लोकतंत्र में विकास बनाम पर्यावरण की बहस का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
विकास बनाम पर्यावरण की बहस
आधुनिक समय में सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि विकास किया जाए या पर्यावरण बचाया जाए, बल्कि यह है कि दोनों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।
एक पक्ष का तर्क है कि—
- उद्योगों से रोजगार मिलता है।
- बाँधों से सिंचाई और बिजली मिलती है।
- सड़कें और आधारभूत संरचना आर्थिक विकास को गति देती हैं।
दूसरी ओर, पर्यावरणविदों का मानना है कि—
- वनों की अंधाधुंध कटाई से पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।
- बड़े बाँधों से विस्थापन और जैव विविधता को नुकसान हो सकता है।
- अनियंत्रित औद्योगिकीकरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को बढ़ाता है।
निष्कर्ष
पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन केवल विज्ञान या भूगोल का विषय नहीं हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति, आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय से भी गहराई से जुड़े हुए हैं।
भारत का दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि विकास आवश्यक है, लेकिन वह पर्यावरण की कीमत पर नहीं होना चाहिए। वहीं, CBDR, Global Commons, Montreal Protocol, जैव विविधता संरक्षण और नर्मदा बचाओ आंदोलन जैसे विषय यह दिखाते हैं कि पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान केवल सरकारों के प्रयासों से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग, वैज्ञानिक सोच और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है।