एक दलीय प्रभुत्व का दौर || Class 12 Political Science ek dal ke prabhutv ka daur Notes

एक दलीय प्रभुत्व का दौर

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स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत की राजनीति में एक लंबे समय तक एक ही राजनीतिक दल का प्रभाव रहा इस कल को ही एक दलीय प्रभुत्व का दौर कहा जाता है | इस दौर में मुख्य रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का देश की राजनीति में वर्चस्व स्थापित रहा यह दो लगभग 1952 से 1967 तक रहा | इस समय भारत में लोकतंत्र तथा लेकिन चुनाव में कांग्रेस पार्टी का लगातार जितना उसकी मजबूत स्थिति को दर्शाता है |

देश में केवल एक ही पार्टी हो भारत में अन्य पार्टियां भी थी लेकिन जनता का विश्वास और चुनावी सफलता मुख्य रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को ही मिलती रही इसलिए इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के अन्दर एक दलीय प्रभुत्व का दौर कहा जाता है |

एक दलीय प्रभुवी के कारण

एक दलीय प्रभुत्व के कारणों को निम्नलिखित बिंदुओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है-

स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका का होना

कांग्रेस पार्टी ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी इसके कारण जनता का कांग्रेस पर गहरा विश्वास था | स्वतंत्रता के बाद भी जनता ने देश की स्थिरता देने के लिए कांग्रेस पार्टी का ही समर्थन किया था |

प्रभावशाली नेतृत्व का होना

इस दौर में कांग्रेस के पास मजबूत और लोकप्रिय नेताओं का होने के कारण उसका प्रभावशाली नेतृत्व भी था लोकतंत्र समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे सिद्धांतों को मजबूत किया और उनकी लोकप्रियता ने ही कांग्रेस को लगातार चुनाव जीतने में मदद की थी |

कमजोर विपक्ष का होना

स्वतंत्रता के बाद विपक्षी दल संगठित नहीं होने के कारण और उनके पास स्पष्ट विचारधारा और मजबूत नेतृत्व ना होने के कारण ही विपक्षी दल राष्ट्रीय कांग्रेस को चुनौती नहीं दे पा रहे थे |

व्यापक संगठनात्मक ढांचे का होना

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी पूरे देश में फैली हुई थी एवं इसके कार्यकर्ता गांव-गांव तक मौजूद थे जिस पार्टी जनता से सीधे जुड़ी रहती थी |

विविधता को समाहित करने की क्षमता का होना

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के अंतर्गत विभिन्न जाति धर्म वर्ग के लोगों को साथ लेकर चलती थी इस समावेशी नीति के कारण ही कांग्रेस पार्टी को व्यापक जन समर्थन मिला था |

एक दलीय प्रभुत्व के चरण

एक दलीय प्रभुत्व के चरणों को निम्नलिखित बिंदुओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है-

प्रारंभिक चुनाव और कांग्रेस की सफलता का होना

स्वतंत्र भारत में पहला आम चुनाव 1951-52 में हुआ था, हालांकि इसके इसको 1952 का चुनाव ही कहा जाता था क्योंकि भारत के अधिकांश भाग में 1952 में ही चुनाव हुए थे इसलिए इसे 1952 का चुनाव भी कहा जाता है | इस दौरान चुनाव में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत मिला इसके बाद 1957 का चुनाव और 1962 के चुनाव में भी कांग्रेस को जीत हासिल हुई इससे यह स्पष्ट हो गया की जनता कांग्रेस को ही शासन के योग्य मानती है |

नीति और विकास कार्यों का होना

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत की थी साथ ही औद्योगिकरण शिक्षा कृषि विकास आदि पर जोर दिया गया इससे देश की विकास मजबूत हुआ |

लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना

इस दौर में संसद न्यायपालिका और चुनाव प्रणाली को मजबूत किया गया साथ ही भारत ने लोकतंत्र को स्थित और सफल बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए थे |

एक दलीय प्रभुत्व के सकारात्मक प्रभाव
राजनीतिक स्थिरता का होना

एक ही पार्टी का शासन होने के कारण देश में स्थिर सरकार बनी रही इससे नीतियों को लागू करने में आसानी हुई थी |

राष्ट्र निर्माण में सहायता

स्वतंत्रता के बाद देश को एकजुट रखना बहुत जरूरी था और कांग्रेस ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया |

मजबूत लोकतंत्र का होना

भारत में यदि कांग्रेस का शासन था लेकिन चुनाव नियमित रूप से होते रहे इससे हमारा भारतीय लोकतंत्र वट वृक्ष बन गया |

एक दलीय प्रभुत्व के नकारात्मक प्रभाव
विपक्ष का कमजोर होना

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का लगातार जितना जिससे विपक्ष पूरी तरीके से कमजोर हो गया था इससे सरकार की आलोचना और नियंत्रण काम हो गया था |

सत्ता का विकेंद्रीकरण होना

कई बार निर्णय निर्णय लेने की शक्ति कुछ नेताओं तक ही सीमित हो गई थी इससे लोकतंत्र में संतुलन की कमी देखी गई |

क्षेत्रीय असंतोष का होना

कुछ क्षेत्रों में लोगों को लगा कि उनकी समस्याओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है इससे क्षेत्रीय दलों का उदय होना प्रारंभ हो गया था |

एक दलीय प्रभुत्व का अंत

1967 के आम चुनाव में कांग्रेस को कई राज्यों में हर का सामना करना पड़ा था इस समय देश में अनेक क्षेत्रीय दल और विपक्षी पार्टियों मजबूत भी हुई थी इसके बाद भारतीय राजनीति में बहुत दलीय व्यवस्था अधिक प्रभावशाली हो गई थी |

बाद में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने फिर मजबूती हासिल की लेकिन पहले जैसा पूर्ण प्रभुत्व कांग्रेस पार्टी का नहीं रहा |

भारतीय लोकतंत्र पर प्रभाव

एक दलीय प्रभुत्व के दौर में भारत के लोकतंत्र को स्थिर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और इस दौर में लोकतांत्रिक संस्थाएं भी अधिक मजबूत हुई और देश विकास के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ने लगा साथी इस दौर में अनुभव से भारतीय राजनीति में विपक्ष की भूमिका की आवश्यकता भी महसूस होने लगी |

निष्कर्ष

अत: यह कहा जा सकता है की एक दलीय प्रभुत्व का दौरा भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण अध्याय है इस दौर में कांग्रेस ने देश को स्थिरता और विकास की ओर नई दिशा प्रदान की थी

हालांकि समय के साथ लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए बहुत दलीय प्रणाली आवश्यक साबित हुई, यह दौर हमें यह सिखाता है कि लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों का मजबूत होना अति आवश्यक है ताकि देश नविन ऊंचाइयों को छू सके |

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