भारतीय राजनीति: नए बदलाव (Recent Developments in Indian Politics)
परिचय
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में लंबे समय तक एक-दलीय प्रभुत्व वाली राजनीतिक व्यवस्था देखने को मिली। प्रारंभिक दशकों में भारतीय राजनीति पर कांग्रेस का प्रभाव इतना अधिक था कि इसे “कांग्रेस प्रणाली” कहा गया।
1990 का दशक भारतीय लोकतंत्र के लिए परिवर्तन का काल था। इस दौरान राष्ट्रीय स्तर पर किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, जिससे गठबंधन सरकारों (Coalition Governments) का दौर शुरू हुआ। इसी अवधि में सामाजिक न्याय की राजनीति, क्षेत्रीय दलों का उदय, आर्थिक उदारीकरण तथा नई राजनीतिक सहमति जैसे महत्वपूर्ण बदलाव सामने आए।
भारतीय राजनीति के इन परिवर्तनों ने लोकतंत्र को अधिक सहभागी और बहुआयामी बनाया। साथ ही, विभिन्न राज्यों और सामाजिक समूहों की राजनीतिक भागीदारी भी पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई।
1990 का दशक: भारतीय राजनीति में परिवर्तन का दौर
1990 का दशक भारतीय राजनीति के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। इस समय तक कांग्रेस का राष्ट्रीय प्रभुत्व काफी कमजोर हो चुका था। 1989 के आम चुनावों के बाद पहली बार केंद्र में स्थिर बहुमत वाली सरकार बनने के बजाय गठबंधन सरकारों का दौर प्रारंभ हुआ।
- कांग्रेस के जनाधार में कमी
- क्षेत्रीय दलों का तेजी से उभरना
- सामाजिक न्याय की राजनीति का विस्तार
- पिछड़े वर्गों एवं अन्य सामाजिक समूहों की राजनीतिक भागीदारी में वृद्धि
- राज्यों की राजनीति का राष्ट्रीय राजनीति पर बढ़ता प्रभाव
इन परिवर्तनों ने भारतीय लोकतंत्र को अधिक प्रतिस्पर्धी और बहुदलीय स्वरूप प्रदान किया।
1989 का आम चुनाव: नई राजनीति की शुरुआत
1989 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं कर सकी।
इसके परिणामस्वरूप नेशनल फ्रंट (National Front) के नेतृत्व में सरकार बनी, जिसे बाहर से भारतीय जनता पार्टी तथा वामपंथी दलों का समर्थन प्राप्त था।
यह पहली बार था जब केंद्र सरकार कई दलों के सहयोग से बनी और राष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन व्यवस्था को नई पहचान मिली।
प्रमुख तथ्य
- 1989 के आम चुनाव ने कांग्रेस के लंबे राजनीतिक प्रभुत्व को चुनौती दी।
- राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय दलों का महत्व बढ़ा।
- गठबंधन सरकारों का युग प्रारंभ हुआ।
- राष्ट्रीय राजनीति में सहयोग और समझौते की राजनीति विकसित हुई।
कांग्रेस प्रणाली का कमजोर होना
स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक कांग्रेस भारतीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली पार्टी रही। लेकिन समय के साथ उसकी लोकप्रियता में गिरावट आने लगी।
इसके प्रमुख कारण थे—
- राज्यों में क्षेत्रीय दलों का मजबूत होना
- विभिन्न सामाजिक वर्गों की नई राजनीतिक आकांक्षाएँ
- विपक्षी दलों का संगठित होना
- स्थानीय मुद्दों का राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव
क्षेत्रीय दलों का बढ़ता प्रभाव
1990 के दशक की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक विशेषताओं में से एक क्षेत्रीय दलों का तेजी से उभरना था।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में अलग-अलग राज्यों की सामाजिक, भाषाई एवं आर्थिक आवश्यकताएँ भिन्न होती हैं। क्षेत्रीय दल इन स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने में सफल रहे।
क्षेत्रीय दलों की बढ़ती भूमिका के कारण—
- राज्यों की आवाज़ राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत हुई।
- संघीय व्यवस्था (Federal System) अधिक प्रभावी बनी।
- केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग बढ़ा।
- राष्ट्रीय सरकारों में राज्यों की भागीदारी बढ़ी।
गठबंधन राजनीति (Coalition Politics)
गठबंधन राजनीति वह व्यवस्था है जिसमें दो या दो से अधिक राजनीतिक दल मिलकर सरकार बनाते हैं, क्योंकि किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता।
1989 के बाद भारतीय राजनीति में गठबंधन सरकारें सामान्य राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बन गईं।
- किसी एक दल को पूर्ण बहुमत न मिलना
- बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था का विकास
- क्षेत्रीय दलों का बढ़ता प्रभाव
- राज्यों की राजनीतिक शक्ति में वृद्धि
Coalition Politics की प्रमुख विशेषताएँ
- साझा न्यूनतम कार्यक्रम (Common Minimum Programme)
सरकार में शामिल दल अपने-अपने विचारों के बावजूद कुछ सामान्य नीतियों पर सहमति बनाते हैं। इन्हीं सहमत नीतियों के आधार पर सरकार कार्य करती है।
- सहमति आधारित निर्णय
बड़े निर्णय विभिन्न सहयोगी दलों के बीच चर्चा और सहमति से लिए जाते हैं।
- क्षेत्रीय हितों को महत्व
क्षेत्रीय दलों की भागीदारी के कारण राज्यों की आवश्यकताओं और स्थानीय विकास से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्राथमिकता मिलने लगी।
- लोकतांत्रिक भागीदारी में वृद्धि
विभिन्न सामाजिक समूहों, राज्यों और राजनीतिक दलों को शासन प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर दिया।
गठबंधन राजनीति के सकारात्मक परिणाम
- लोकतंत्र अधिक सहभागी बना।
- क्षेत्रीय आकांक्षाओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व मिला।
- किसी एक दल के अत्यधिक प्रभुत्व की संभावना कम हुई।
- विभिन्न विचारधाराओं के बीच सहयोग की संस्कृति विकसित हुई।
- संघीय व्यवस्था अधिक मजबूत हुई।
चुनौतियाँ
हालाँकि गठबंधन व्यवस्था लोकतंत्र को अधिक प्रतिनिधिक बनाती है, लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियाँ भी रही हैं—
- सहयोगी दलों के बीच मतभेद
- सरकार की स्थिरता पर प्रभाव
- नीति निर्माण में अधिक समय लगना
- राजनीतिक समझौतों की आवश्यकता
- कभी-कभी सरकार का अल्पकालिक होना
मंडल आयोग (Mandal Commission)
1979 में जनता पार्टी सरकार ने किया था। इसके अध्यक्ष बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल थे। आयोग का उद्देश्य भारत में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की सामाजिक और शैक्षिक स्थिति का अध्ययन करना तथा उनके उत्थान के लिए सुझाव देना था।
अपनी रिपोर्ट 1980 में प्रस्तुत की। आयोग ने अनुमान लगाया कि देश की लगभग 52% जनसंख्या अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित है और सरकारी नौकरियों में उनके लिए 27% आरक्षण की सिफारिश की।
आयोग की प्रमुख सिफारिशें
- केंद्र सरकार की नौकरियों में OBC वर्ग के लिए 27% आरक्षण।
- सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को विशेष अवसर प्रदान करना।
- पिछड़े वर्गों की सरकारी सेवाओं और शिक्षा में भागीदारी बढ़ाना।
- सामाजिक न्याय एवं समान अवसर को प्रोत्साहित करना।
आयोग की सिफारिशों का लागू होना (1990)
1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की प्रमुख सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की। इस निर्णय का भारतीय राजनीति पर व्यापक प्रभाव पड़ा।
सकारात्मक प्रभाव
- पिछड़े वर्गों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ा।
- सामाजिक न्याय की अवधारणा को नई मजबूती मिली।
- OBC वर्ग राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
- कई नए सामाजिक एवं राजनीतिक नेतृत्व उभरकर सामने आए।
चुनौतियाँ
- देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए।
- आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में व्यापक बहस छिड़ी।
- सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण की स्थिति बनी।
मंडल राजनीति ने भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक न्याय को एक केंद्रीय राजनीतिक मुद्दा बना दिया और पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी को मजबूत किया।
अयोध्या आंदोलन (Ayodhya Movement)
1990 के दशक की दूसरी महत्वपूर्ण घटना अयोध्या आंदोलन थी। यह आंदोलन भारतीय राजनीति में धार्मिक पहचान (Religious Identity) और सांस्कृतिक मुद्दों के बढ़ते प्रभाव का प्रतीक माना जाता है। इस आंदोलन ने राष्ट्रीय राजनीति में नए राजनीतिक विमर्श को जन्म दिया।
आंदोलन का राजनीतिक प्रभाव
- धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आए।
- कई राजनीतिक दलों के जनाधार में परिवर्तन हुआ।
- चुनावी राजनीति में सांस्कृतिक एवं धार्मिक मुद्दों की भूमिका बढ़ी।
- भारतीय राजनीति में पहचान-आधारित (Identity-based) राजनीति का विस्तार हुआ।
6 दिसंबर 1992 की घटना
6 दिसंबर 1992 को अयोध्या स्थित विवादित ढाँचा गिरा दिया गया। इस घटना के बाद देश के अनेक भागों में सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की घटनाएँ हुईं। इसने भारतीय राजनीति, समाज और धर्मनिरपेक्षता पर व्यापक बहस को जन्म दिया।
आर्थिक उदारीकरण (Economic Liberalisation), 1991
1991 में भारत गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार में भारी कमी, बढ़ता राजकोषीय घाटा और भुगतान संतुलन (Balance of Payments) की समस्या के कारण सरकार को व्यापक आर्थिक सुधार लागू करने पड़े।
तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में तथा तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने नई आर्थिक नीति लागू की।
नई आर्थिक नीति (New Economic Policy)
नई आर्थिक नीति के तीन प्रमुख आधार थे—
- उदारीकरण (Liberalisation)
सरकारी नियंत्रण और लाइसेंस प्रणाली में कमी की गई ताकि उद्योगों और व्यापार को अधिक स्वतंत्रता मिल सके।
- निजीकरण (Privatisation)
सरकारी क्षेत्र के साथ-साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा दिया गया।
- वैश्वीकरण (Globalisation)
भारत की अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था से अधिक जोड़ा गया तथा विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहन दिया गया।
आर्थिक सुधारों का राजनीतिक प्रभाव
- आर्थिक विकास राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडा का महत्वपूर्ण विषय बना।
- विकास, निवेश और रोजगार जैसे मुद्दों को अधिक महत्व मिला।
- राज्यों के बीच निवेश आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा बढ़ी।
- आर्थिक नीतियों में अधिकांश राष्ट्रीय दलों के बीच व्यापक सहमति विकसित होने लगी।
- सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की भूमिकाओं में नया संतुलन स्थापित हुआ।
1990 के दशक की राजनीति की विशेषताएँ
- सामाजिक न्याय की राजनीति — मंडल आयोग के माध्यम से पिछड़े वर्गों का सशक्तिकरण।
- पहचान आधारित राजनीति — अयोध्या आंदोलन के कारण धार्मिक एवं सांस्कृतिक मुद्दों का बढ़ता प्रभाव।
- आर्थिक सुधारों की राजनीति — 1991 की नई आर्थिक नीति के माध्यम से विकास और उदारीकरण पर बल।
नई राजनीतिक सहमति (New Political Consensus)
1990 के दशक में भारतीय राजनीति में अनेक परिवर्तन हुए, लेकिन समय के साथ कुछ ऐसे मुद्दे उभरकर सामने आए जिन पर अधिकांश राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के बीच व्यापक सहमति विकसित हुई। इस स्थिति को “नई राजनीतिक सहमति (New Political Consensus)” कहती है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी राजनीतिक दलों की विचारधारा एक जैसी हो गई, बल्कि यह कि कुछ राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर मतभेद कम हुए और साझा दृष्टिकोण विकसित हुआ।
नई राजनीतिक सहमति की प्रमुख विशेषताएँ
लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता
लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने संसदीय लोकतंत्र, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव, संविधान तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास बनाए रखा। सत्ता परिवर्तन चुनावों के माध्यम से शांतिपूर्ण ढंग से होने लगा, जिससे भारतीय लोकतंत्र और अधिक परिपक्व हुआ।
गठबंधन राजनीति की स्वीकृति
1989 के बाद गठबंधन सरकारें भारतीय राजनीति का सामान्य हिस्सा बन गईं। समय के साथ राजनीतिक दलों ने यह स्वीकार किया कि विविधताओं से भरे भारत में सहयोग, संवाद और साझा कार्यक्रम के आधार पर भी प्रभावी शासन संभव है।
आर्थिक सुधारों पर व्यापक सहमति
1991 में शुरू हुई आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया को बाद की विभिन्न सरकारों ने भी जारी रखा। यद्यपि सुधारों की गति और प्राथमिकताओं में अंतर रहा, लेकिन अधिकांश दलों ने आर्थिक विकास, निवेश, उद्योग और आधारभूत संरचना के विस्तार को आवश्यक माना।
संघीय व्यवस्था का सशक्त होना
क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव से राज्यों की भूमिका राष्ट्रीय राजनीति में अधिक महत्वपूर्ण हुई। केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग, वित्तीय भागीदारी तथा नीति-निर्माण में समन्वय बढ़ा। इससे भारतीय संघवाद को नई मजबूती मिली।
सामाजिक न्याय की निरंतरता
मंडल आयोग के बाद सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य वंचित समूहों के अधिकार भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण विषय बने रहे। लगभग सभी दलों ने इन वर्गों के प्रतिनिधित्व और कल्याण को अपनी नीतियों में स्थान दिया।
निष्कर्ष
भारतीय राजनीति: नए बदलाव भारतीय लोकतंत्र समय के साथ निरंतर विकसित होता रहा है। 1990 के दशक में गठबंधन राजनीति, क्षेत्रीय दलों का उदय, सामाजिक न्याय की राजनीति, अयोध्या आंदोलन और आर्थिक उदारीकरण जैसे परिवर्तन केवल राजनीतिक घटनाएँ नहीं थे, बल्कि उन्होंने शासन, समाज और अर्थव्यवस्था की दिशा को भी प्रभावित किया।
भारत की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति उसकी विविधता, समावेशिता और परिवर्तन के अनुरूप स्वयं को ढालने की क्षमता है। यही कारण है कि अनेक चुनौतियों के बावजूद भारतीय लोकतंत्र आज भी विश्व के सबसे बड़े और सबसे सशक्त लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
FAQs
प्रश्न1. भारतीय राजनीति में नए बदलाव कब शुरू हुए?
उत्तर- 1989 के आम चुनावों के बाद प्रमुख परिवर्तन देखने को मिले।
प्रश्न 2. गठबंधन राजनीति क्या है?
उत्तर- जब दो या अधिक दल मिलकर सरकार बनाते हैं, उसे गठबंधन राजनीति कहते हैं।
प्रश्न 3. मंडल आयोग का गठन कब हुआ?
उत्तर- 1979 में।
प्रश्न 4. मंडल आयोग के अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर- बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल।
प्रश्न 5. मंडल आयोग की प्रमुख सिफारिश क्या थी?
उत्तर- OBC वर्ग के लिए 27% आरक्षण।
प्रश्न 6. मंडल आयोग की सिफारिशें कब लागू हुईं?
उत्तर- 1990 में।
प्रश्न 7. नई आर्थिक नीति कब लागू हुई?
उत्तर- 1991 में।
प्रश्न 8. नई आर्थिक नीति के तीन आधार क्या थे?
उत्तर- उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण।
प्रश्न 9. 1991 में प्रधानमंत्री कौन थे?
उत्तर- पी. वी. नरसिम्हा राव।
प्रश्न 10. 1991 के वित्त मंत्री कौन थे?
उत्तर- डॉ. मनमोहन सिंह।
प्रश्न 11. अयोध्या आंदोलन किस दशक में प्रमुख हुआ?
उत्तर- 1990 के दशक में।
प्रश्न 12. 6 दिसंबर 1992 क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर- इस दिन अयोध्या का विवादित ढाँचा गिराया गया।
प्रश्न 13. क्षेत्रीय दलों का महत्व क्यों बढ़ा?
उत्तर- उन्होंने राज्यों और स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी ढंग से उठाया।
प्रश्न 14. नई राजनीतिक सहमति का अर्थ क्या है?
उत्तर- कुछ प्रमुख राष्ट्रीय मुद्दों पर अधिकांश दलों के बीच सहमति विकसित होना।
प्रश्न 15. गठबंधन राजनीति का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
उत्तर- विभिन्न सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों को प्रतिनिधित्व मिलना।
प्रश्न 16. आर्थिक सुधारों का उद्देश्य क्या था?
उत्तर- भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी और खुला बनाना।
प्रश्न 17. सामाजिक न्याय की राजनीति किससे जुड़ी है?
उत्तर- पिछड़े और वंचित वर्गों के समान अवसर एवं प्रतिनिधित्व से।
प्रश्न 18. क्या गठबंधन राजनीति भारतीय लोकतंत्र की कमजोरी है?
उत्तर- यह भारत की सामाजिक और राजनीतिक विविधता का लोकतांत्रिक प्रतिबिंब है।