राष्ट्र निर्माण के समक्ष चुनौतियां || Rashtra Nirman ki Chunautiyan

राष्ट्र निर्माण के समक्ष चुनौतियां

लगभग 200 वर्षों की गुलामी के बाद 14-15 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि को हिंदुस्तान आजाद हुआ लेकिन इस आजादी के साथ ही देश की जनता को देश के विभाजन का सामना भी करना पड़ा |

भारतीय संविधान सभा के विशेष सत्र में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने “भाग्य वधू से चिर प्रतिष्ठ भेंट” अर्थात (ट्रस्ट की डेस्टिनी) के नाम से एक भाषण भी दिया था |

आजादी की लड़ाई के समय विशेष रूप से दो बातों पर सहमति बनी थी जिसमें मुख्य रूप से –

  • आजादी के बाद देश का शासन लोकतांत्रिक पद्धति के माध्यम से चलाया जाएगा |
  • सरकार द्वारा सभी वर्गों का ख्याल रखा जाएगा अर्थात सभी वर्गों के लिए सरकार कार्य करेगी |

राष्ट्र – निर्माण के समक्ष चुनौतियां

राष्ट्र निर्माण के समक्ष चुनौतियों को निम्नलिखित बिंदुओं में देखा जा सकता है जो मोटे तौर पर तीन भागों में बांटी गई है –

एकता और अखंडता 

भारत अपने आकार और विविधता में किसी महादेश के बराबर था भारत वर्ष में अनेक भाषाएं संस्कृतियों और धर्म के अनुयाई रहते थे, इन सभी को एकजुट बनाए रखने की सबसे महत्वपूर्ण चुनौती थी |

लोकतंत्र की स्थापना

भारत ने संसदीय शासन पर आधारित प्रतिनिधि मूलक लोकतंत्र को बनाया था और भारतीय संविधान में प्रत्येक नागरिक को मौलिक अधिकार और मतदान का अधिकार दिया गया था साथ ही भारतीय लोकतंत्र को वैश्विक मंच पर एक नजीर के रूप में भी बनाए रखने की चुनौती थी जिसे बखूबी भारतीयों ने बनाए रखा |

समानता पर आधारित विकास 

भारतीय लोकतंत्र के समक्ष भारतीय राष्ट्र निर्माण के समक्ष तीसरी महत्वपूर्ण चुनौती थी कि समानता पर आधारित विकास किस तरह किया जाए और ऐसा विकास जिसमें संपूर्ण समाज का कल्याण हो न कि किसी एक वर्ग विशेष का अर्थात सभी के साथ समान व्यवहार किया जाए और सामाजिक रूप से वंचित वर्गों और धार्मिक, सांस्कृतिक, अल्पसंख्यक समुदाय को विशेष सुरक्षा प्रदान की जाए |

भारत विभाजन विस्थापन और परिणाम

  • मुस्लिम लीग ने “द्वि-राष्ट्र सिद्धांत” को अपनाने के लिए तर्क दिया था कि भारत किसी एक कौम का नहीं अभी तो हिंदू और मुस्लिम नाम की दो कोमो का देश है और इसी कारण मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए एक अलग देश अर्थात पाकिस्तान की मांग की थी |
  • भारत के विभाजन का आधार भी धार्मिक अल्पसंख्यकको बनाया गया |
  • मुसलमानों की जनसंख्या के आधार पर पाकिस्तान के दो इलाके शामिल होंगे जिसमें पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान और उनके मध्य में भारतीय भू-भाग का बड़ा विस्तार रहेगा |
  • मुस्लिम बहुल इलाका पाकिस्तान में जाने को राजी नहीं था अर्थात पश्चिम उत्तर सीमा प्रांत के नेता “अब्दुल गफ्फार खान” जिन्हें “सीमांत गांधी” के नाम से भी जाना जाता था वह भी राष्ट्र सिद्धांत के बिल्कुल खिलाफ थे |
  • ब्रिटिश इंडिया के मुस्लिम बहुल प्रांत पंजाब और बंगाल में अनेक हिस्सों में बहुसंख्यक गैर मुस्लिम आबादी वाले लोग भी थे ऐसे में इन प्रति का बंटवारा भी धार्मिक अल्पसंख्यक के आधार पर या निचले स्तर के प्रशासनिक हलके को आधार बनाकर किया गया था |
  • भारत का विभाजन केवल धर्म के आधार पर हुआ था इसलिए दोनों और के अल्पसंख्यक बड़े असमंजस में थे, कि उनका क्या होगा |

विभाजन की समस्याएं

भारत के विभाजन की समस्याओं को निम्नलिखित बिंदुओं में देखा जा सकता है –

  • भारत विभाजन की योजना में यह नहीं कहा गया कि दोनों भागों से अल्पसंख्यकों का विस्थापन भी होगा, विवाद से पहले ही दोनों देशों के बंटने वाले इलाकों में हिंदू मुस्लिम दंगे भड़क उठे थे |
  • विभाजन की प्रक्रिया में भारत की भूमिका ही बंटवारा नहीं हुआ, बल्कि भारत की संपदा का भी बंटवारा हुआ |
  • आजादी और विस्थापन के कारण भारत को विरासत के रूप में शरणार्थियों के पुनर्वास की समस्या भी देखने को मिली |
  • लोगों के पुनर्वास को बड़े ही संयम ढंग से व्यावहारिक रूप प्रदान किया गया |
  • शरणार्थियों के लिए पुनर्वास के लिए सर्वप्रथम एक पुनर्वास मंत्रालय भी बनाया गया |
रजवाड़ों का विलय

स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले भारत दो भागों में बांटा हुआ था अर्थात ब्रिटिश भारत और देशी रियासतें इन देसी रियासतों की संख्या लगभग 565 थी |रियासतों के शासको को मानने और समझने का कार्य सरदार वल्लभभाई पटेल जो कि भारत की प्रथम गृहमंत्री ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी और अधिकतर रजवाड़ों को उन्होंने भारतीय संघ में शामिल होने के लिए राजी भी कर लिया |

सरकार का दृष्टिकोण
  • अधिकतर राजवाड़ा के लोग भारतीय संघ में शामिल होना चाहते थे |
  • भारत सरकार कुछ इलाकों को थोड़ी सुविधा देने के लिए भी तैयार थी |
  • विभाजन की पृष्ठभूमि में विभिन्न इलाकों के सीमांकन के सवाल पर भी खींचतान हो रही थी |
  • क्षेत्रीय एकता और अखंडता के प्रश्न भी सबसे महत्वपूर्ण थे |
  • अधिकतर राजवाड़ा के शासको ने भारतीय संघ में शामिल होने के लिए एक “सहमति पत्र” पर हस्ताक्षर कर दिए थे इस सहमति पत्र को “इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन” कहा जाता है |
  • लेकिन जूनागढ़, हैदराबाद, जम्मू कश्मीर और मणिपुर की रियासतों का विलय बाकी रियासतों की तुलना में थोड़ा कठिन साबित हुआ |
हैदराबाद 

हैदराबाद के शासक को “निजाम” कहा जाता था उन्होंने भारत सरकार के साथ नवंबर 1947 में 1 साल के लिए यथास्थिति बहाल करने का समझौता भी किया था कम्युनिस्ट पार्टी और हैदराबाद कांग्रेस के नेतृत्व में किसानों और महिलाओं ने निजाम के खिलाफ आंदोलन भी शुरू कर दिया था |

रजाकार

इस आंदोलन को कुचलने के लिए निजाम ने एक अर्ध सैनिक बल को लगाया था जिसे “रजाकार” कर के नाम से जाना जाता है जवाबी कार्यवाही में भारत सरकार ने 1948 में सैनिक कार्यवाही के द्वारा निजाम को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया और इस तरह हैदराबाद भारत का अभिन्न बन गया |

जम्मू एंड कश्मीर 

जम्मू एंड कश्मीर का भारत में विलय 26, अक्टूबर 1947 को हुआ जब वहां के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह ने इस पर हस्ताक्षर किए पाकिस्तान समर्थित कव्वालियों ने जम्मू कश्मीर पर आक्रमण कर दिया था |

इसके बाद यह निर्णय लिया गया और इस तरह 27, अक्टूबर 1947 को विलय पत्र प्रभावित हो गया |

1954 के राष्ट्रपति के आदेश के बाद जम्मू कश्मीर रियासत भारतीय संविधान के अंतर्गत एक राज्य बनी जिसे अक्टूबर,2019 को पुनर्गठित कर केंद्र शासित प्रदेश के रूप में बनाया गया |

जूनागढ़ रियासत 

जूनागढ़ रियासत का विलय भी भारत में 9 नवंबर, 1947 को हुआ पाकिस्तान में शामिल होने के नवाब के फैसले के खिलाफ जनता के विद्रोह अर्थात (आर जी हुकूमत) और सरदार पटेल के हस्तक्षेप (सैन्य घेराव) बाद नवाब कराची भाग गए और इसके बाद 20 फरवरी, 1948 को जनमत संग्रह करा कर अर्थात 91%लोगों के साथ जूनागढ़ को भारत का अभिन्न अंग बना लिया |

महाराज बोधचंद्र सिंह

मणिपुर की आंतरिक स्वायतता बनी रहे इसको लेकर महाराज बोधचंद्र सिंह और भारत सरकार के बीच विलय के सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए जनता के दबाव में जून 1948 में चुनाव करवाया गया इस निर्वाचन के फलस्वरूप ही संवैधानिक राजतंत्र कायम हुआ |

मणिपुर भारत का पहला भाग है जहां पर “सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार” के आधार पर जून,1948 में चुनाव हुए और इस तरह भारत सरकार ने मणिपुर को भी भारतीय संघ में विलय कर लिया |

निष्कर्ष

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि राष्ट्र निर्माण के समक्ष महत्वपूर्ण चुनौतियां थी जिसमें मुख्य रूप से भारत भूमि को एकता और अखंडता की चुनौती का सामना करना, भारतीय लोकतंत्र को बनाए रखने की चुनौती और समानता पर आधारित विकास को बनाए रखने की चुनौती थी|

यद्यपि भारत ने उपरोक्त चुनौतियों का निष्ठा पूर्वक सामना करते हुए आज देश की एकता और अखंडता को बरकरार रखा साथ ही भारतीय लोकतंत्र को भी एक वट वृक्ष के रूप में रूप दिया और वैश्विक मंच पर विकास को भी बोल दिया और यही कारण है कि आज वैश्विक मंच पर भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था आसमान को छू रही है |

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