राज्यों का पुनर्गठन Reorganisation of States in India
राज्यों का पुनर्गठन औपनिवेशिक शासन के समय प्रति का गठन प्रशासनिक सुविधा के अनुसार किया गया था लेकिन स्वतंत्र भारत में भाषा और सांस्कृतिक बहुलता के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन की मांग हुई थी |
राज्यों के पुनर्गठन को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर देखा जा सकता है –
- भाषा के आधार पर प्रति का गठन राजनीतिक मुद्दा कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन 1920 में पहली बार शामिल किया गया |
- तेलुगु भाषी लोगों ने मांग की थी कि मद्रास प्रांत के तेलुगु वासी इलाकों को अलग करके एक नया राज्य आंध्र प्रदेश बनाया जाए |
- आंदोलन के दौरान ही कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता पोट्टी श्रीरामुलु ने की 56 दिनों की भूख हड़ताल के बाद मृत्यु हो गई थी |
- पोट्टी श्रीरामुलु की मृत्यु के उपरांत सरकार को दिसंबर, 1952 में आंध्र प्रदेश नाम से एक अलग राज्य बनाने की घोषणा करनी पड़ी | इस प्रकार आंध्र प्रदेश भाषा के आधार पर गठित होने वाला पहला राज्य बन गया था |
राज्य पुनर्गठन आयोग
1953 में केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश फजल अली की अध्यक्षता में तीन सदस्य राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना की थी जिसकी सिफारिश को निम्नलिखित बिंदुओं में देखा जा सकता है –
- इस आयोग ने त्रिस्तरीय राज्य प्रणाली को समाप्त किया जाए अर्थात भाग ए, बी, सी राज्य प्रणाली को समाप्त किया जाए |
- केवल तीन केंद्र शासित प्रदेशों अर्थात अंडमान निकोबार,दिल्ली, मणिपुर को छोड़कर बाकी के केंद्र शासित क्षेत्रों को उनके नजदीकी राज्यों में मिला दिया जाए |
- राज्यों की सीमा का निर्धारण भी वहां पर बोली जाने वाली भाषा होनी चाहिए
इस आयोग ने 1955 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी और इसके आधार पर ही संसद में राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 पारित किया गया और देश को 14 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों में बांटा गया |
14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश
राज्य
- आंध्र प्रदेश
- असम
- बिहार
- मुंबई
- जम्मू और कश्मीर
- केरल
- मध्य प्रदेश
- मद्रास
- मैसूर
- उड़ीसा
- ) पंजाब
- राजस्थान
- उत्तर प्रदेश
- पश्चिम बंगाल
केंद्र शासित प्रदेश
- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह
- दिल्ली
- हिमाचल प्रदेश
- लक्षद्वीप, मिनिकॉय और अमीनदीवी द्वीप समूह
- मणिपुर
- त्रिपुरा
अन्य राज्यों की गठन एवं वर्ष
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क्रम सं. |
राज्य | नविन राज्य | वर्ष |
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1. |
मुंबई | महाराष्ट्र, गुजरात |
1960 |
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2. |
असम | नागालैंड |
1963 |
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3. |
वृत्तर पंजाब | हरियाणा, पंजाब | 1966 |
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4. |
वृत्तर उत्तर पंजाब | हिमाचल प्रदेश |
1966 |
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5. |
असम | मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा |
1972 |
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6. |
असम | मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश |
1987 |
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7. |
उत्तर प्रदेश | उत्तराखंड |
2000 |
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8. |
बिहार | झारखंड |
2000 |
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9. |
मध्य प्रदेश | छत्तीसगढ़ |
2000 |
| 10. | आंध्र प्रदेश | तेलंगाना |
2014 |
| 11 | जम्मू-कश्मीर | जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (केंद्र शासित प्रदेश) |
2019 |
भाषा के आधार पर राज्य के पुनर्गठन के पक्ष में तर्क
- भाषाई आधार से प्रशासन में स्थानीय भागीदारी को बढ़ावा मिलेगा |
- भाषाई क्षेत्र स्वाभाविक रूप से स्थानीय रूप से निरंतर थे जिससे उनका प्रबंधन आसान हो जाता था |
- स्थानीय भाषाएँ अब फल-फूलरही है |
- देश के कई हिस्सों में अत्यधिक विस्फोटक स्थिति उत्पन्न हो गई थी, साथ ही भाषा ही राज्यों की स्थापना के निर्णय ने स्थिति को वर्णन बदलने की बदलने में सहायता की |
भाषा के आधार पर राज्य के पुनर्गठन का विरोध करने के कारण
- भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन होने से क्षेत्रीयता की भावना को बढ़ावा मिला है |
- भाषा के आधार पर राज्यों में पुनर्गठन का विरोध करने वालों का मानना है कि इससे देश के बीच आर्थिक सहयोग मेंबाधा उत्पन्न होती है |
- इससे पड़ोसियों के प्रति शत्रुता पूर्ण रवैया विकसित हुआ है |
फजल अली आयोग
आंध्र प्रदेश के गठन ने अन्य क्षेत्रों में भी भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की मांग को तेज कर दिया था और सरकार को इस पूरे मामले पर पुनर्विचार करने के लिए विवश होना पड़ा |राज्य पुनर्गठन आयोग अर्थात फजल अली आयोग के नाम से जाना जाने वाला एक नया आयोग गठित किया गया था |
यह आयोग तीन सदस्य राज्य पुनर्गठन आयोग था, जिसकी स्थापना दिसंबर, 1953 में की गई थी इसके न्यायमूर्ति फजल अली (अध्यक्ष) एवं दो अन्य सदस्य के.एम. पणिक्कर, और हृदयनाथ कुंजरू थे आयोग ने सितंबर, 1955 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी | जिसमें राज्यों का पुनर्गठन के लिए चार प्रमुख कारकों को स्वीकार किया था –
- सर्वप्रथम भाषाई और सांस्कृतिक समानताएं होना |
- भारत की एकता और अखंडता को मजबूत करना एवं सुरक्षित करना |
- प्रशासनिक,आर्थिक विचार और वित्तीय विचार का होना |
- जनकल्याण की योजना बनाना और उसको बढ़ावा देना |
इस प्रकार से सरकार ने मामूली बदलाव के साथ इन सिफारिश को स्वीकार कर लिया राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 के द्वारा भाग-क और भाग-ख राज्यों के बीच का भेद समाप्त कर दिया गया और भाग्-ग राज्यों को समाप्त कर दिया |
कुछ राज्यों को पड़ोसी राज्य में मिला दिया गया जबकि अन्य राज्यों को केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया | हालांकि राज्यों का पुनर्गठन एक अधूरा काम था क्योंकि भाषा ही पुनर्गठन का परिणाम दीर्घकाल में उतना सकारात्मक नहीं रहा |
निष्कर्ष
रूप में कहा जा सकता है की बड़े और छोटे दोनों ही प्रकार के राज्यों में अच्छा प्रदर्शन किया और खराब प्रदर्शन का संबंध आकार से होना आवश्यक नहीं है वास्तविक में देखा जाए तो आज सूचना प्रौद्योगिकी बड़े क्षत्रों के शासन को आसान बनाने और दूर दराज के क्षेत्र को भी आपस में जोड़ने में सहायक हो सकती है |
लेकिन मोटे तौर पर भाषा के आधार पर राज्यों को पुनर्गठन को वास्तविकता में सही नहीं मापा जा सकता, क्योंकि इससे देश कई भागों में बांटने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है और देश की एकता और अखंडता को खतरा हो सकता है |