भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार || मौलिक अधिकार के प्रकार

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार

मौलिक अधिकारों से तात्पर्य है ऐसे अधिकार जो लोगों को जीवन के लिए अति आवश्यक या मौलिक समझ जाते हैं उन्हें मौलिक या मूल अधिकार कहा जाता है |1928 में मोतीलाल नेहरू समिति ने भी अधिकारों के लिए घोषणा पत्र की मांग उठाई थी ,जो की स्वतंत्रता के बाद इन अधिकारों में से अधिकांश को भारतीय सूची में सूचीबद्ध कर दिया गया |

मौलिक अधिकार प्रकार

भारतीय संविधान में भाग – 3 में मूल रूप से 7 मौलिक अधिकार थे, जिसमें से 44वें संविधान संशोधन द्वारा संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों की सूची से निकाल दिया गया वर्तमान में 6 मौलिक अधिकार हैं जिनको निम्नलिखित बिंदुओं मेंदेखा जा सकता है –

समानता का अधिकार (अनुच्छेद – 14 से 18)

  • अनुच्छेद-14 में कहा गया है कि कानून के समक्ष समानता तथा बिना किसी भेदभाव के समान कानूनी सुरक्षा प्रदान की जाएगी |
  • अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जाएगा |
  • अनुच्छेद 16 के अनुसार सार्वजनिक पदों पर नियुक्तियों में अवसर की समानता | परंतु अनुच्छेद 16(4) के तहत राज्य को नागरिकों के किसी पिछड़े वर्ग के पक्ष में आरक्षण देने का अधिकार देता है |
  • अनुच्छेद 17 के अनुसार भारतीय समाज से छुआछूत अर्थात अस्पृश्यता की समाप्ति पर बल दिया गया है |
  • अनुच्छेद 18 के अनुसार सैनिक एवं शैक्षणिक उपाधियों के अलावा अन्य उपाधियां नहीं दी जाएगी |

स्वतंत्रता का अधिकार – (अनुच्छेद 19 से 22)

  • अनुच्छेद 19 के तहत भारत के नागरिकों को विशेष रूप से 6 बुनियादी स्वतंत्रताएं प्रदान की गई है, जैसे-
  1. विचार एवं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता |
  2. बिना हथियारों के शांतिपूर्वक सम्मेलन करने की स्वतंत्रता |
  3. संघ या संगठन बनाने की स्वतंत्रता |
  4. भारत के किसी भी भू-भाग में भ्रमण करने की स्वतंत्रता |
  5. भारत के किसी भी भू-भाग में निवास करने की स्वतंत्रता |
  6. भारत में कहीं भी व्यापार व्यवसाय या कोई भी कारोबार या काम करने की स्वतंत्रता |
  • अनुच्छेद – 20 अपराध में अभियुक्त या दंडित व्यक्ति को संरक्षण प्रदान करता है | 44वें संविधान संशोधन द्वारा यह प्रावधान किया गया कि अनुच्छेद 20 को आपात स्थिति के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता
  • अनुच्छेद – 21 के तहत कानूनी प्रक्रिया के अतिरिक्त किसी भी व्यक्ति को जीवन जीने से वंचित नहीं किया जा सकता | अनुच्छेद 21(क) – 86वें संविधान संशोधन 2002 द्वारा शिक्षा के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया| जिसमें 6 से14 वर्ष की आयु प्राप्त बच्चों को मुक्त एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान की गई |
  • अनुच्छेद – 22 के तहत किसी भी नागरिक को विशेष मामलों में गिरफ्तारी एवं हिरासत से सुरक्षा प्रदान करता है |
शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)
  • अनुच्छेद 23 के अनुसार मानव व्यापार अर्थात तस्करी और बल प्रयोग द्वारा जैसे बेगारी, बंधुआ मजदूरी आदि प रप्रतिबंध लगाया गया |
  • अनुच्छेद 24 के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी जोखिम वाले काम पर नहीं लगाया जा सकता जैसे – खदान, कल कारखाने या खतरनाक कार्यों में |
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार – (अनुच्छेद 25 से 28)
  • अनुच्छेद 25 के अनुसार अपने-अपने धर्म को मानने पालन करने या प्रचार प्रसार करने की स्वतंत्रता प्राप्त है |
  • अनुच्छेद 26 के अनुसार संगठित इकाई के रूप में धार्मिक तथा परोपकारी कार्य करने वाले संस्थानों को स्थापित करने का अधिकार है
  • अनुच्छेद 27 के अनुसार किसी भी धर्म का प्रचार प्रचार एवं धार्मिक संप्रदाय की देखरेख के लिए कर देने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा |
  • अनुच्छेद 28 के अनुसार कुछ शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक पूजा में उपस्थित के बारे में स्वतंत्रता प्रदान करता है |
  • अनुच्छेद 28 (1) के अनुसार किसी भी सरकारी शिक्षण संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी |
संस्कृति और शिक्षा का अधिकार – (अनुच्छेद 29 से 30)
  • अनुच्छेद 29 के अनुसार भारत के किसी भी राज्य के नागरिक को अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार प्राप्त होगा |
  • अनुच्छेद 30 के अनुसार भाषा धार्मिक अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थानों की स्थापना तथा उनके प्रशासन को चलाने का अधिकार प्रदान किया गया है |
संवैधानिक उपचारों का अधिकार – (अनुच्छेद – 32) 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के अनुसार संवैधानिक उपचारों का अधिकार प्राप्त होगा| भारतीय संविधान के जनक डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस अधिकार को “भारतीय संविधान का हृदय” और “आत्मा” कहा है | इसके अंतर्गत न्यायालय के कई विशेष आदेश जारी करते हैं जिन्हें रीट कहा जाता है जो की 5 प्रकार की है |

बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)

बंदी प्रत्यक्षीकरण  यह एक महत्वपूर्ण न्यायिक आदेश या रीट है जिसका अर्थ है “शरीर को प्रस्तुत करें” अर्थात यदि किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में लिया गया है तो उसके विरुद्ध एक संवैधानिक सुरक्षा उपाय है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय एवं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय द्वारा जारी किया जा सकता है इसके तहत अदालत अवैध रूप से यदि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को तुरंत रिहा करने का आदेश दे सकती है |

परमादेश (Mandamus)

परमादेश का अर्थ है “हम आदेश देते” हैं अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय द्वारा किसी भी लोक अधिकारी सरकारी निकाय निगम या निचली अदालतों को उनके गैर कानूनी या सार्वजनिक कर्तव्य का पालन करने का निर्देश देने के लिए जारी किया जाता है जब वह ऐसा करने में विफल रहते हैं तो यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह अपने दायित्वों को पूरा करें ताकि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके |

प्रतिषेध (Prohibition)

प्रतिषेध का अर्थ है “किसी कार्य को करने से रोकना” अर्थात “मनाही या निषेध” भारतीय कानून में यह एक उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय को उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने या उससे आगे कार्य करने से रोकने के लिए जारी किया जाता है यह एक नकारात्मक आज्ञा है जो किसी भी गलत कार्यवाही को रोकते हैं |

अधिकार पृच्छा (Quo warranto)

अधिकार पृच्छा भारत के सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा जारी की जाने वाली एक याचिका है जो किसी व्यक्ति से यह पूछता है कि उसने “किस आधार या शक्ति के तहत” कोई सार्वजनिक पद ग्रहण किया है अर्थात इसयाचिका का प्रमुख उद्देश्य है सार्वजनिक उपक्रमों या कर्म के अवैध कब्जे को रोकना |

उत्प्रेषण (Ccertiorari)

इस याचिका के तहत सर्वोच्च या उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय न्यायाधिकरणों या अर्धन्यायिक अधिकारियों को जारी की जाने वाली एक सुधारात्मक आदेश है जिसका मतलब होता है “प्रमाणित होना” या “सूचित होना” यह रिट किसी लंबित मामले को ऊपरी अदालत में भेजना या निकले न्यायालय के गलत निर्णय को रद्द करने के लिए जारी की जाती है जो अधिकार क्षेत्र के अभाव या कानूनी त्रुटि के आधार पर लागू होती है |

निष्कर्ष

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान के भाग – 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक जो मौलिक अधिकार दिए गए हैं वह हमारी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की आधार शिला है साथ ही यह मौलिक अधिकार नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकार के साथ-साथ संवैधानिक उपचारों का अधिकार भी प्रदान करते हैं |

मौलिक अधिकार राज्य की शक्ति पर नियंत्रण लगाकर नागरिकों की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं एवं इन अधिकारों को न्यायालय द्वारा लागू भी किया जा सकता है अर्थात इनका उल्लंघन होने पर सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय का सहारा लिया जा सकता है इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का मुख्य उद्देश्य भारत में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, पर्यावरण, प्रौद्योगिकी, सूचना,कानूनी, न्याय, आदि स्थापित कर लोकतंत्र को मजबूत बनाना है |

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