चीन का एक आर्थिक शक्ति के रूप में उदय
चीन में 1949 में माओ के नेतृत्व में साम्यवादी क्रांति के बाद चीनी जनवादी गणराज्य की स्थापना की गई थी हालांकि यहां की अर्थव्यवस्था सोवियत प्रणाली पर आधारित थी |
माओ के नेतृत्व में चीन का विकास
- चीन ने विकास का जो मॉडल अपनाया था उसके अंतर्गत खेती से पूंजी निकाल कर सरकारी नियंत्रण के बड़े उद्योगों को खड़ा करने पर बोल दिया गया जिसका उद्देश्य था अपने सारे संसाधनों को उद्योगों में लगाना |
- चीन अपने नागरिकों को रोजगार सामाजिक कल्याण की योजनाओं एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ देने के मामले में भी विकसित देशों से काफी आगे निकल गया था |
- चीन ने कृषि के परंपरागत तरीकों पर आधारित होने के कारण वहां के उद्योगों की जरूरत को पूरा नहीं कर पा रहा था |
चीनी अर्थव्यवस्था का उत्थान
चीनी अर्थव्यवस्था के उत्थान के अंतर्गत चीन में हुए सुधारो की पहल को निम्नलिखित बिंदुओं में देखा जा सकता है –
- 1972 में चीन ने अमेरिका से संबंध बनाकर अपने राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को गति प्रदान की थी |
- चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने 1973 में विज्ञान और प्रौद्योगिकी सेवा उद्योग कृषि आदि क्षेत्रों में आधुनिकीकरण पर बल दिया था |
- चीन के प्रसिद्ध नेता “देंग श्याओ पेंग” ने 1978 में आर्थिक सुधारो को लेकर के “खुले द्वार के नीति” पर बोल दिया था |
- 1982 में चीन ने “खेती की निजीकरण” पर बोल दिया |
- 1998 में चीन ने “उद्योगों का निजीकरण” किया गया साथ ही “स्पेशल इकोनामिक जोन” (SEZ) स्थापित किए गए |
- वर्ष 2001 में चीन WTO (विश्व व्यापार संगठन) में शामिल हो गया
चीन की नई उभरती शक्ति के रूप में
चीनी अर्थव्यवस्था वैश्विक स्तर पर एक नई शक्ति के रूप में उभर करके सामने आयी, जिनको निम्नलिखित बिंदुओं में देखाजा सकता है –
- चीन का क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे सबसे विशाल आकार होना |
- चीन 2001 में विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना |
- चीन की अर्थव्यवस्था एक बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में सबके सामने खड़ी है |
- आसियान,रूस,अमेरिका और जापान इन सबसे पुराने विवादों को चीन अब भी बुला चुके हैं |
- 1997 के वित्तीय संकट के बाद आसियान देशों की अर्थव्यवस्था को टिकाए रखने में भी चीन ने काफी मदद की थी |
- दुनिया की पांच महासक्तियों में परमाणु शक्ति संपन्न देश चीन भी महाशक्ति है |
- चीन सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य भी है |
- आज चीन दुनिया के कई देशों को अपने निवेश और सहायता की नीतियों के रूप में प्रदर्शित कर रहा है जो कि इसकी नवीन शक्ति के रूप में उभर को दर्शा रहा है |
भारत – चीन संबंध
भारत और चीन के संबंधों को निम्नलिखित बिंदुओं के रूप में देखा जा सकता है जिसमें मुख्य रूप से विवाद और सहयोग के क्षेत्रों को दर्शाया गया है |
विवाद के क्षेत्र
- 1950 में चीन द्वारा तिब्बत को हड़पने के नीति को लेकर के दोनों के मध्य संबंध बिगड़ गए थे |
- अरुणाचल प्रदेश एवं लद्दाख के अक्साई चीन क्षेत्र को लेकर के भी दोनों के मध्य विवाद बना हुआ, जिसके चलते 1962 में भारत और चीन के मध्य युद्ध हुआ था |
- 1962 के युद्ध में यदि भारत की हार हुई और इसका असर भारत और चीन के संबंधों पर दीर्घकालिक रूप में दिखाई दिया |
- वर्ष 1976 तक भारत और चीन के मध्य कूटनीतिक संबंध मुख्य रूप से समाप्त ही रहे थे |
- भारत और चीन के मध्य सीमा विवाद को लेकर हमेशा विवाद की स्थिति ही रही |
- चीन द्वारा पाकिस्तान के परमाणु हथियार कार्यक्रम में मदद करना भी भारत और चीन के मध्य संबंधों में खटास पैदा करने वाला विषय रहा है |
- बांग्लादेश, म्यांमार से चीन के सैनिक संबंधों को भी दक्षिण एशिया में भारत के संबंधों के खिलाफ माना गया है |
- संयुक्त राष्ट्र संघ में भी चीन द्वारा भारत के खिलाफ वीटो का प्रयोग भी दोनों संबंधों को भी खटास के रूप में देखा जा सकता है |
- चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा जैसे अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी भारत और चीन के मध्य हमेशा विवाद रहा है |
भारत और चीन के मध्य सहयोग मूलक संबंध
- 1970 के दशक में चीन में राजनीतिक परिवर्तन के साथ ही भारत और चीन के मध्य संबंधों में भी परिवर्तन को देखा गया |
- 1970 के दशक में वैचारिक मुद्दों के स्थान पर व्यवहारिक मुद्दों पर बल दिया गया |
- भारत और चीन के मध्य न केवल राजनीतिक बल्कि आर्थिकसां,स्कृतिक संबंधों के रूप में भी दोनों देशों के सहयोग मुल्क क्षेत्र पर बल दिया गया |
- भारत और चीन वैश्विक स्तर के साथ-साथ एशिया की राजनीति में भी अपनी अर्थव्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं |
- 1988 में राजीव गांधी द्वारा चीन का दौरा घर संबंधों को सुधारने पर बोल दिया गया
- 1990 के दशक में भारत और चीन द्वारा सांस्कृतिक आदान-प्रदान विज्ञान तकनीक के क्षेत्र आदि में परस्पर सहयोग और व्यापार की सीमा खोलने पर समझौते किए गए |
भारत और चीन के मध्य सहयोग मूलक संबंध
- भारत और चीन के बीच साल दर साल व्यापारिक संबंध भी तेजी के साथ बढ़ रहे हैं |
- वैश्विक स्तर पर भी भारत और चीन राजनीतिक,सामाजिक,सांस्कृतिक प्रौद्योगिकी,आर्थिक,व्यापारिक आदि विषयों को लेकर सहयोग मूलक व्यवस्था पर बल देते हैं |
- दोनों देशों के मध्य परिवहन संचार मार्गों की बढ़ोतरी के साथ-साथ आर्थिक हितों के कारण भी संबंधों में सकारात्मक रवैया देखने को मिल रहा है |
- दोनों देशों के राष्ट्रीय अध्यक्ष समय-समय पर वर्तमान में एक दूसरे देश का दौरा कर संबंधों को सुदृढ़ करने पर बल दिया जा रहा है |
निष्कर्ष – उपरोक्त बिंदुओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में भारत और चीन के मध्य संबंधों में काफी सुधार आया है और ने केवल वैश्विक स्तर पर बल्कि दक्षिण एशिया में भी भारत और चीन दोनों के ही द्वारा राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक,प्रौद्योगिकी, संचार आदि के क्षेत्र में सहयोग मुल्क सुरक्षा पर बल देने की ओर आगे बढ़ रहे हैं यद्यपि हमें चीन को लेकर के हमेशा सजक रहना होगा एवं साथ ही वैश्विक स्तर पर भी अपने देश की विदेश नीति को कूटनीतिक तरीके से आगे बढ़ाने के साथ-साथ दक्षिण एशिया में भी अपनी पकड़ को मजबूत रखना होगा |